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Showing posts from September, 2022

मानव स्वभाव के तीन महान गुणों के प्रतीक - गांधी जी के तीन बन्दर

भारत केवल संतों, महापुरूषों और देशभक्तों की जन्मभूमि ही नहीं  है बल्कि  विलक्षण प्रतिभा के धनी लोगों की कर्मभूमि भी है। जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था तो भारत को आज़ाद करवाने में देश के कोने कोने से  प्रत्येक वर्ग के बच्चों,युवाओं और बुजुर्गों ने अपने अपने तरीके से योगदान दिया जिनकी वजह से देश स्वतंत्र हुआI इस आजादी आन्दोलन के सबसे बड़े महानायक  थे मोहनदास करमचंद  गांधी जी, जिनका जन्म दिन  प्रति वर्ष 2 अक्टूबर को  भारत में गांधी जयंती के रूप में और पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। वे सत्याग्रह के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार के अग्रणी नेता थे,उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धांत पर रखी गयी थी जिसने भारत को आजादी दिलाकर पूरी दुनिया में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतंत्रता के प्रति आन्दोलन के लिए प्रेरित किया I उन्हें दुनिया महात्मा गाँधी के नाम से जानती है कुछ इतिहासकारों के  मतानुसार  उन्हें  यह संबोधन सबसे पहले 1915 में राजवैद्य जीवराम कालीदास ने दिया था जिसका अर्थ  संस्कृत भाषा म...

समाज सेवा का सशक्त माध्यम- राष्ट्रीय सेवा योजना

  किसी राष्ट्र के निर्माण में युवाओं का बहुत बड़ा योगदान होता है। आज देश में तकरीबन 65 प्रतिशत  जनसंख्या युवा है। इस मद्देनजर यह देश के लिए सौभाग्य की बात है कि देश का चौमुखी विकास एकसाथ हो सकता है। इसके लिए आजादी के समय गांधी जी ने युवाओं को राष्ट्रीय सेवा से जोड़ने पर विशेष बल दिया था। आज राष्ट्रीय सेवा योजना समाज सेवा का सशक्त माध्यम बन चुका है। हर साल की तरह 24 सितंबर को राष्ट्रीय सेवा योजना दिवस मनाया जा रहा है।स्वैच्छिक समुदाय सेवा के माध्यम से युवा छात्रों के व्यक्तित्व, राष्ट्र सेवा के लिए उन्हें जागरूक बनाने  और चरित्र के विकास के प्राथमिक उद्देश्य से राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) को 1969 में शुरू किया गया था। राष्ट्रीय सेवा योजना का प्रमुख लक्ष्य समाज सेवा के माध्यम से विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का समुचित विकास करना है । इससे देश का युवा वर्ग जन-कल्याण की भावना से राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ता है । युवा शक्ति का सदुपयोग योजनाबद्ध तरीके से करके रचनात्मक कार्यों को अंजाम देना इसका उद्देश्य है। साधारण शब्दों में यह योजना मुख्य रूप से भटके हुए लक्ष्यविहीन युवाओं की ऊ...

रिश्तों की बुनियाद कमजोर करती सोशल मीडिया से दोस्ती

  हमारा देश प्रगति के मार्ग पर है और इसमें   इंटरनेट का महत्व बहुत अधिक है  अब हर काम को घर से ही इंटरनेट के जरिए किया जा सकता है फिर हमारा सामाजिक क्रिया-कलाप इसमें पीछे कैसे रह सकता है । सोशल मीडिया के  आगमन से हम  देश-विदेश के लोगों से जुड़ गए हैं ।आजकल जहाँ सोशल मीडिया बहुत ही सार्थक लगने लगा है तो वहीं इसके दुष्परिणाम भी बहुत सामने आ रहे हैं । चूंकि सोशल मीडिया हमें देश-विदेश से जोड़ रहा है । इसलिए हमारी संस्कृति पर विदेशी प्रभाव पड़ता जा रहा है ।खास कर बच्चे और युवा वर्ग विदेशी संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं । जिससे उनके विचार, व्यवहार, पहनावे-ओढ़ावे में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है । आज युवा पैसा कमाने के लिए गलत तरीके अपनाने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं आज सोशल मीडिया का दुरूपयोग एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा बन चुका है जो कि एक नासूर की तरह समाज और संस्कृति को खोखला करता जा रहा है जहां ना रिश्तों की परवाह है , ना किसी की इज्जत की I चंडीगढ़ की एक निजि विश्व-विद्यालय में हुआ  प्रकरण भी भविष्य के ऐसे भयावह  समाज का आईना दिखा रहा  है I जब से स्मार...

हिंदी की उपेक्षा आखिर कब तक

एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी है। बहुत सरल, सहज और सुगम भाषा होने के साथ हिंदी विश्व की संभवतः सबसे वैज्ञानिक भाषा है जिसे दुनिया भर में समझने, बोलने और चाहने वाले लोग बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। जिसके लिए कवि मैथिलीशरण गुप्त ने हिंदी के लिए कहा था.. "है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी" भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 सितंबर 1949 को  महात्मा गांधी की सोच को आधारभूत मानते हुए कहा था कि “भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए” उन्होंने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा था, “अंग्रेज़ी से हमने  बहुत कुछ हासिल किया,बहुत कुछ सीखा और प्रगति भी की है, पर किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता “  14 सितंबर 1949  को संविधान...

देश व समाज के शिल्पकार - शिक्षक

शिक्षक, शिक्षण प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण अंग है। शिक्षक के बिना शिक्षा की प्रक्रिया सफल रुप से नहीं चल सकती। हमारे देश में शिक्षा के क्षेत्र में जो क्रांति का उदय हुआ है उसमें शिक्षकों का विशेष योगदान है। गुरु-शिष्य परंपरा तो हमारी संस्कृति की पहचान है। हमारे देश में शिक्षक अर्थात गुरु को तो भगवान से भी बढ़ कर बताया गया है।  शिक्षक की क्रिया और व्यवहार का प्रभाव उसके विद्यार्थियों,विद्यालय और समाज पर पड़ता है।इस दृष्टि से कहा जाता है कि शिक्षक राष्ट्र का निर्माता होता है। चाणक्य ने कहा था- ‘ शिक्षक कभी साधारण नहीं होता । प्रलय व उत्पत्ति दोनों उसकी गोद में पलते हैं ' और ये बात आज भी उतनी ही सच है । ये शिक्षा ही है जो सही दिशा में मिले तो मनुष्य को देवता बना देती है और गलत दिशा में मिले तो दानव l  अगर हम भारत के स्वर्णिम काल की बात करें तो वैदिक काल में शिक्षा पूर्णतः निशुल्क थी और पूरी तरह से दान से मिले धन से चलती थी । राजा हो या साधारण प्रजा , सबके बच्चे एक ही वातावरण में रहकर साथ पढ़ते थे । राज परिवार हो या सत्ता के शीर्ष पर बैठे हुए अन्य प्रभुत्वशाली लोग, सबके लिए एक ...