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Showing posts from July, 2022

भूस्खलन एवम् बाढ़ –कम नहीं है मानव का योगदान

 आजकल पूरे  भारत में मानसून अपने चरम पर है और  ऐसे में स्वाभाविक है कि इस समय वर्षा होगी ही चाहे  कहीं कम हो या  कहीं ज्यादा। जहां ज्यादा वर्षा  होगी वहां बाढ़ के  साथ साथ भूस्खलन का खतरा भी मंडराएगा और इस भयावह परिस्थिति से आये दिन हिमाचल वासियों को जूझना पड़ता है  क्यूंकि यहाँ की  भौगोलिक स्थिति ऐसी है  जहाँ मानसून के दौरान भूस्खलन बार-बार आते हैं। जिनसे न केवल जान माल का भारी  नुक्सान होता है बल्कि बाढ़ की समस्या भी उत्पन्न होती हैं। अगर हम पिछले कुछ वर्षों का आंकड़ा देखें तो अनुचित वनों की कटाई, सड़क काटने, अत्याधिक भवन निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण इसमें काफी उछाल आया है मानसून के दौरान शिवालिक और निचले व मध्य पर्वत श्रृंखला में भारी बारिश के कारण ब्यास, रावी, सतलुज तथा चंद्रभागा नदी घाटियों के ऊंचाई के क्षेत्रों की मुख्य समस्या अचानक आने वाली बाढ़ तथा नदियों की ऊंच़ी ढलानों में भारी बारिश के चलते भूमि कटाव एवं नदियों का तेज प्रवाह है। अक्सर बादल फटने के कारण आने वाली बाढ़, ग्लेशियर  झील का फटना और भूस्खलन के कारण अस्थ...

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 —शिक्षा के नवीनीकरण से परिवर्तन की उम्मीद

 जैसे की हम जानते ही हैं कि शिक्षा  व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिए बहुत आवश्यक है। इसलिए ये ज़रूरी है की शिक्षा की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए वक्त के साथ शिक्षा नीति में भी बदलाव किया जाता रहे  और कहते हैं कि जीवन बदलाव का नियम है और  यदि यह बदलाव सकारात्मक है, तो यह जीवन को एक नई दिशा प्रदान करता है। जिस तरह से एक जगह रुका हुआ पानी बदबू मारने लगता है उसी तरह से एक पुरानी पद्धति चाहे वो शिक्षा व्यवस्था से ही सम्बंधित हो, से भी पढाई करने पर बच्चों को शिक्षा से लाभ मिलना बंद हो जाता है इसी सकारात्मक बदलाव की और अग्रसर होते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय  शिक्षा नीति 2020 को लागू  करके शिक्षा के नवीनीकरण की ओर पहल की  है जो कि  निःसंदेह एक सराहनीय कदम है, जो बच्चो के मानसिक विकास को बढ़ावा देगा साथ ही अब यह विषयो को रटने की पद्धिति का त्याग कर उसे समझने के सिद्धांत पर कार्य करेगा। राष्ट्रीय  शिक्षा नीति 2020 को   भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई 2020 को घोषित किया गया। यह नीति अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर...

पशुओं की सुरक्षा के लिए समर्पित त्यौहार - चिङनु

 वैसे तो हिमाचल प्रदेश में परंपरागत तौर पर मनाये जाने वाले त्योहारों की संख्या बहुत  अधिक है  लेकिन पशुओं की रक्षा एवं  स्वास्थ्य के लिए मनाया जाने वाला   चिङनु त्यौहार अपना  एक विशेष महत्त्व रखता है  जिसे सावन महीने की पहली प्रविष्टि यानि सक्रांति को हिमाचल के हर हिस्से में  बड़ी धूम धाम से  मनाया जाता है। जहाँ कांगड़ा, हमीरपुर, मंडी, उना, बिलासपुर, आदि मैदानी इलाकों में इसे “चिङनु या चिङन” के नाम से जाना जाता है। वहीँ  लाहौल में इसे “शेगत्सम” और किन्नौर तथा जुब्बल में “दखरैण” के कहा जाता है। इस त्यौहार को मनाने के पीछे एकमात्र उदेश्य अपने पशुधन को सुरक्षित रखना होता है I दरअसल प्राचीन समय में जब लोग अपने पशुओं को चराने जंगल ले जाते थे तो  जंगल में चरते समय घास से एक विशेष प्रकार के छोटे परजीवी कीट पशुओं की टांगों द्वारा पूरे शरीर में फ़ैल जाते थे जिन्हें चिडडन या चिडणु कहते हैं यह खटमल की तरह का जीव होता है जिसे हिंदी में किलनी कहा जाता है किलनी के खून चूसने की वजह से पशु कमजोर हो जाते हैं। उनमें खुजली एवं जलन की समस्या बढ़ जात...

जनसंख्या वृद्धि से बिगड़ता स्वरूप

 आज पूरा   विश्व दिनों दिन बढ़ती जनसंख्या के कारण विकराल रूप धारण करती समस्याओं के  बोझ तले दबता चला जा  रहा है और इससे  न केवल हमारा आर्थिक संतुलन बिगड़ रहा है बल्कि सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, जिससे प्राकृतिक एवं मानव जन्य आपदाओं तथा जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियां गंभीर सिर उठा रही हैं। इस जटिल समस्या से सबसे अधिक जूझने वाला अगर कोई देश है तो वो हमारा भारत है अभी भारत की आबादी 137 करोड़ है, वहीं चीन की आबादी 143 करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र की विश्व आबादी पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 2027 तक भारत की आबादी दुनिया में सर्वाधिक होकर 150 करोड़ के पार पहुंच जाएगी। ऐसे में 2027 तक चीन को पीछे करके भारत दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। भारत में जनसंख्या और प्राकृतिक संसाधनों का अनुपात बेहद असंतुलित है। दुनिया की 2.4 फीसदी जमीन भारत के हिस्से में है, जबकि यहां संसार की तकरीबन 18 फीसदी जनसंख्या निवास करती है। संसाधन कम हैं और जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, ऐसे में देश के सामने भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी से लेकर शिक्षा-...