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हिंदी की उपेक्षा आखिर कब तक

एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी है। बहुत सरल, सहज और सुगम भाषा होने के साथ हिंदी विश्व की संभवतः सबसे वैज्ञानिक भाषा है जिसे दुनिया भर में समझने, बोलने और चाहने वाले लोग बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। जिसके लिए कवि मैथिलीशरण गुप्त ने हिंदी के लिए कहा था..

"है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी"

भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में 13 सितंबर 1949 को  महात्मा गांधी की सोच को आधारभूत मानते हुए कहा था कि “भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना चाहिए” उन्होंने बहस में हिस्सा लेते हुए कहा था, “अंग्रेज़ी से हमने  बहुत कुछ हासिल किया,बहुत कुछ सीखा और प्रगति भी की है, पर किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता “ 

14 सितंबर 1949  को संविधान सभा के  अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने  हिंदी को  भारतीय गणराज्य की राजभाषा घोषित करते हुए  कहा था “आज हमारा ऐसा संविधान बना है जिसमें हमने अपनी भाषा रखी है, जो संघ के प्रशासन की भाषा होगी I केंद्र जिस भाषा का प्रयोग करेगा उससे हम एक-दूसरे के निकटतर आते जाएंगे I अंग्रेज़ी की जगह पर हमने एक भारतीय भाषा को अपनाया है, जो हमें एक-दूसरे से जुड़ने में मदद करेगी I जिसकी वजह ये भी है कि हमारी परंपराएं एक हैं, हमारी संस्कृति एक ही है और हमारी सभ्यता भी एक है “ इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता और  हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है। आज हिन्दी विश्व की सर्वाधिक प्रयोग की जाने वाली तीसरी भाषा है, विश्व में हिन्दी की प्रतिष्ठा एवं प्रयोग दिनों दिन बढ़ता जा रहा है, लेकिन देश में इसकी  उपेक्षा एक बड़ा प्रश्न है। सच्चाई तो यह है कि देश में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को जो सम्मान मिलना चाहिए, वह स्थान एवं सम्मान अंग्रेजी को मिल रहा है। अंग्रेजी और अन्य विदेशी भाषाओं की सहायता जरूर ली जाए लेकिन तकनीकी एवं कानून की पढ़ाई के माध्यम के तौर पर अंग्रेजी को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। आज भी भारतीय न्यायालयों में अंग्रेजी में ही कामकाज होना राष्ट्रीयता को कमजोर कर रहा है। हालाँकि राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में आपसी लोगों से सम्पर्क स्थापित करने का शानदार  कार्य किया है। लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए। 

हिंदी को लेकर प्रत्येक भारतीय का मन बेशक  संवेदनशील हो लेकिन उसका गुजारा अंग्रेजी के बिना नहीं होता है। वर्षों से  हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाये जाने  की वकालत हो रही है लेकिन  हिंदी आज भी अपनी उसी दयनीय  हालत पर खड़ी है जिसमें बात करने को आज युवा कतराता है । हर साल सितम्बर का महीना हिंदी के नाम होता है और बाकी  के 11 महीने अंग्रेजी को समर्पित। ऐसे में हिंदी को जनभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित किये जाने की जो कवायद है, वह आयोजनों तक ही रह गई है। कल तक तो  उच्च श्रेणी  के लोग ही अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाते थे, अब निम्न आय वर्ग भी अंग्रेजी स्कूलों के मोहपाश में बंध गया है। आखिर यह स्थिति आयी क्यों, इस पर चिंतन की जरूरत है।वोट बैंक की राजनीति के चलते  स्वतंत्रता के 75 वर्ष उपरांत भी इस देश को सही मायने में एक भाषा नहीं मिल पाई है, जिसमें पूरा देश बातचीत कर सके। जिस भाषा को अंग्रेजों ने हमारे ऊपर थोपा, उसे लोग बड़े शौक से अपनी दिनचर्या में शामिल कर रहे हैं। अंग्रेज तो इस देश से चले गए, पर अंग्रेजियत आज भी हम पर  हावी है। जब भी हिंदी दिवस आता है, हिंदी पखवाड़ा, हिंदी सप्ताह का आयोजन  कर, हिंदी पर लम्बे-लम्बे वक्तव्य देकर, प्रतियोगिता आयोजित कर कुछ लोगों को हिंदी के नाम पर सम्मान एवं इनाम देकर इतिश्री कर ली जाती है। हिंदी पखवाड़ा समाप्त होते ही हिंदी भी  वर्ष भर के लिए विदा हो जाती है। राष्ट्रभाषा किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है, जिसमें पूरा देश संवाद करता है, जिससे राष्ट्र की पहचान होती है। यह तभी संभव है जब सभी भारतवासी दोहरी मानसिकता को छोड़कर राष्ट्रभाषा हिंदी को अपने जीवन में अपनाने की शपथ मन से लें। भाषा वही जीवित रहती है जिसका प्रयोग जनता करती है। भारत में लोगों के बीच संवाद का सबसे बेहतर माध्यम हिन्दी है। इसलिए इसको एक-दूसरे में प्रचारित करने की आवश्यकता है । आज  हिन्दी दिवस के अवसर पर सभी से निवेदन है कि वे अपने बोलचाल की भाषा में हिंदी का उपयोग ज्यादा से ज्यादा करें क्यूंकि  हिंदी भाषा के प्रसार से पूरे देश में एकता की भावना और मजबूत होगी।

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