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Showing posts from August, 2022

आस्था का प्रतीक---गुग्गा नवमी

 भारत की प्राकृतिक छटाएँ इसे अपूर्व सौंदर्य से अलंकृत करती हैं। जहाँ दक्षिण में इसके चरणों को सागर की लहरें धोती है तो वहीँ उत्तर में हिमालय की श्वेत चोटियाँ इसका मुकुट बनाती हैं। हिमालय की इसी  गोदी में बसा हिमाचल प्रदेश अपनी बहुरंगी संस्कृति व सौंन्दर्य से ओत-प्रोत इसी प्राकृतिक सौंदर्य का एक अंश है। सदियों  से इस प्रदेश का लोक-जीवन, रहन-सहन, रीति-रिवाज व अनेक देव-परम्पराओं का स्वरूप आज भी अतीत की यादें दोहराता है ।। कदम-कदम पर बदलती हुई लोक भाषा, अनेकों रीति-रिवाजों, भिन्न-भिन्न लोक नृत्यों व देव परम्पराओं से जुड़ा होने के कारण ही यह प्रदेश देव-भूमि कहलाता है । यहाँ  सदियों से चली आ रही बहुत सी परम्पराएँ  आज भी जिंदा है और लोगों की भी इसमें पूरी आस्था है। उसी आस्था की प्रतीक है 9 दिन तक चलने वाली गुगा गाथा जिसे नंगे पांव गुगा का छत्र उठाकर मंडलियां रक्षाबंधन को अपने मंदिरों से निकलती हैं   तथा  जन्माष्टमी तक गुगा जाहरवीर, जिन्हें राजा छतरी जाहरवीर के नाम से भी जाना जाता है,  का घर-घर गुणगान करके नवमी को  अपने घरों में  वापिस पहुँच...

स्वतंत्रता दिवस -नए दौर में बदलते आजादी के मायने

 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर हिन्दुस्तान में घर घर  लहराता तिरंगा,  हमें स्वतंत्र भारत का नागरिक होने का अहसास करा रहा  है। स्वतंत्रता दिवस हमारा राष्ट्रीय पर्व है,  हमारा हिन्दुस्तान  15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से स्वतंत्र हुआ था। जरा कल्पना  करिए उन लम्हों की  जब इस देश की जनता  ने आजादी की पहली साँस ली होगी | खुली हवा में अपने अरमानों के पंख फ़ैलाने का सुखद एहसास कितना मनोरम रहा होगा| हर तरफ बस आजादी का जयघोष हो रहा होगा | न जाने कितने बरसों से अंग्रेजों की  गुलामी को झेलते हुए  जो सपना हम आजादी का देख रहे थे उसका अचानक सच हो जाना कितना आनंदित  कर देने वाला होगा | हम गुलामी के जंजीरों से मुक्त होकर अपने सपनों का संसार रचने को पूर्णतया स्वतंत्र  हो चुके थे | भारत ने इसके लिए  एक लम्बी और कठिन यात्रा तय की जिसमें अनेक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अभियान शामिल थे और इसके दो मुख्य हथियार थे–सत्य-अहिंसा और क्रांति का मार्ग। जिसकी शुरुआत सन्‌ 1857 में  प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ के सूत्रधार बने  महर्षि दयानन्द स...

आत्मीयता और स्नेह की डोर – रक्षाबन्धन

नारी सम्मान एवं सुरक्षा पर केन्द्रित, बेहद शालीन और सात्विक  तौर पर सदियों से मनाया जाने वाला रक्षाबन्धन हिन्दूधर्म का प्रमुख सांस्कृतिक, सामाजिक और पारिवारिक पर्व है जिसे  प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह आपसी संबंधों की एकबद्धता, प्रेम एवं एकसूत्रता का सांस्कृतिक उपक्रम है इस दिन बहनें अपने भाई के दायें हाथ पर राखी बाँधकर उसके माथे पर तिलक करती हैं और उसकी दीर्घ आयु की कामना करती हैं। बदले में भाई उनकी रक्षा का वचन देता है। ऐसा माना जाता है कि राखी के रंगबिरंगे धागे भाई-बहन के प्यार के बन्धन को मजबूत करते हैं और सुख-दुख में साथ निभाने का विश्वास दिलाते हैं। सगे भाई बहन के अतिरिक्त अनेक भावनात्मक रिश्ते भी इस पर्व से बँधे होते हैं जो धर्म, जाति और देश की सीमाओं से परे हैं। सीमाओं पर जवानों को राखी बांधने का भी प्रचलन है I इस तरह रक्षाबन्धन आत्मीयता और स्नेह के बन्धन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का पर्व है। यही कारण है कि इस पर्व के साथ न केवल बहन भाई के लिये अपितु अन्य रिश्तों एवं सम्बन्धों में प्रगाढ़ता, आत्मीयता एवं सौहार्द का सन्देश है।  रा...