भारत की प्राकृतिक छटाएँ इसे अपूर्व सौंदर्य से अलंकृत करती हैं। जहाँ दक्षिण में इसके चरणों को सागर की लहरें धोती है तो वहीँ उत्तर में हिमालय की श्वेत चोटियाँ इसका मुकुट बनाती हैं। हिमालय की इसी गोदी में बसा हिमाचल प्रदेश अपनी बहुरंगी संस्कृति व सौंन्दर्य से ओत-प्रोत इसी प्राकृतिक सौंदर्य का एक अंश है। सदियों से इस प्रदेश का लोक-जीवन, रहन-सहन, रीति-रिवाज व अनेक देव-परम्पराओं का स्वरूप आज भी अतीत की यादें दोहराता है ।। कदम-कदम पर बदलती हुई लोक भाषा, अनेकों रीति-रिवाजों, भिन्न-भिन्न लोक नृत्यों व देव परम्पराओं से जुड़ा होने के कारण ही यह प्रदेश देव-भूमि कहलाता है । यहाँ सदियों से चली आ रही बहुत सी परम्पराएँ आज भी जिंदा है और लोगों की भी इसमें पूरी आस्था है। उसी आस्था की प्रतीक है 9 दिन तक चलने वाली गुगा गाथा जिसे नंगे पांव गुगा का छत्र उठाकर मंडलियां रक्षाबंधन को अपने मंदिरों से निकलती हैं तथा जन्माष्टमी तक गुगा जाहरवीर, जिन्हें राजा छतरी जाहरवीर के नाम से भी जाना जाता है, का घर-घर गुणगान करके नवमी को अपने घरों में वापिस पहुँच...