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Showing posts from January, 2022

कोरोना ने बदला शिक्षा देने का तरीका

 देश में कोरोना की शुरुआत  30 जनवरी 2020 में केरल में मिले एक मरीज से हुई और धीरे-धीरे पिछले  दो वर्षों में कोरोना ने देश में तबाही के कई मंज़र दिखा दिए। इसका व्यापक असर, न केवल उद्योगों और व्यापार पर पड़ा, बल्कि इसका एक बड़ा असर स्कूलों पर, बच्चों की मानसिक स्थिति और उनकी मनोदशा पर भी पड़ा है। लगभग दो वर्ष से महामारी के कारण पूरे भारत के अधिकांश स्कूल लगभग बंद चल रहे हैं। बच्चे घरों में ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं। स्कूली छात्रों की सामान्य दिनचर्या, जिसमें केवल क्लासरूम में प्रत्यक्ष पढ़ाई ही नहीं शामिल होती है, बल्कि अन्य ऐसी  गतिविधियां जिनसे उनका सर्वागीण विकास होता है भी  बाधित हो गयी हैं। कोविड महामारी का सबसे गहन प्रभाव देश की शिक्षा व्यवस्था के संचालन को लेकर दिख रहा है, जो मानव संसाधन के निर्माण के साथ ही युवा भारत की सामथ्र्य से भी जुड़ा हुआ है। महामारी के चलते स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से तात्कालिक कदम के रूप में शैक्षिक संस्थानों को प्रत्यक्ष भौतिक संचालन से मना कर दिया गया, फिर कक्षा की पढ़ाई और परीक्षाएं जहां भी संभव थीं, आभासी (वर्चुअल) माध्यम से शुरू ...

राष्ट्रीय मतदाता दिवस की प्रासंगिकता

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और मतदाता और उसका मत ही भारतीय लोकतंत्र या किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र का मूल आधार होता है l भारतीय मतदाताओं का मतदान के प्रति घटते रुझान को दूर करने के लिए साल 2011 से भारतीय निर्वाचन आयोग ने हर साल 25 जनवरी के दिन राष्ट्रीय मतदाता दिवस मानने का निर्णय लिया था I यह दिन भारत के सभी मतदाताओं के नाम है ताकि उन्हें लोकतंत्र के प्रति उनके दायित्वों की याद रहे और वह खुद इसके महत्व को समझ सकें l इस दिन भारत के प्रत्येक नागरिक को अपने राष्ट्र के प्रत्येक चुनाव में भागीदारी की शपथ लेनी चाहिए, क्योंकि भारत के प्रत्येक व्यक्ति का वोट ही देश के भावी भविष्य की नींव रखता है। इसलिए हर एक व्यक्ति का वोट राष्ट्र के निर्माण में भागीदार बनता है। यहां एक वोट भी सरकार और सत्ता बदलने के लिए काफी होती है l याद करिए वह समय जब माननीय पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार मात्र एक वोट से अपनी सरकार बचाने में नाकाम रही थी l अब आप सोचिए कि ‘मेरे एक वोट से क्या बदलेगा’ जैसी घटिया सोच की वजह से देश को कितना नुकसान हुआ है भारत में जितने भी चुनाव होते हैं, उनको निष्पक्षता से संपन्न...

भारत के महानायक सुभाष चंद्र बोस

भारत की आजादी की लड़ाई मैं यूं तो लाखों करोड़ों हिंदुस्तानियों ने भाग लिया लेकिन कुछ ऐसे सपूत भी थे जो इस आजादी की लड़ाई के प्रतीक बनकर उभरे l राष्ट्र धर्म की खातिर क्रांति की पहली गोली चलाने वालों को भले ही तोपों से उड़ा दिया गया, लेकिन जो चिंगारी उन्होंने लगाई उस आग में तप कर निकले स्वाधीनता सेनानियों ने अपने अहिंसक आंदोलन से अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया l आजादी की इस महागाथा में उन युवा महानायकों को भी याद रखा जाएगा जिन्होंने बहरे कानों को सुनाने के लिए धमाके किए तो किसी ने देश के लिए आजाद शहीद होना चुना l खून के बदले आजादी के नारों के साथ सेना का गठन कर शक्तिशाली बर्तानवी साम्राज्य को चुनौती देने का साहस करने वाले वीरों  और भारत को खंडित होने से बचाने वाले फौलादी इरादों से ही इस स्वतंत्र भारत की नीव पड़ी है l "निजी जीवन से देश बड़ा होता है हम मिटते हैं, तब देश खड़ा होता है" ऐसे ही कुछ थे मिट्टी के लाल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी , आजाद हिंद फौज के सुप्रीम कमांडर नेताजी सुभाष चंद्र बोस  जिन्होंने इन पंक्तियों को सार्थक किया। "दिल्ली चलो, ज...