किसी भी देश के विकास के लिए युवा वर्ग को रीढ़ की हड्डी माना जाता है । अगर युवा जागृत एवं चेतन होंगे तो फिर देश का भविष्य कभी भी अंधकारमयी नहीं हो सकता।युवा राष्ट्र का भूत एवं भविष्य को जोड़ने का सेतु होने के साथ ही समाज के नैतिक मूल्यों का भी प्रतीक होते हैं। देश की युवा शक्ति ही राष्ट्र को जीवन मूल्य एवं सांस्कृतिक विरासत का प्रसार एवं आधार प्रदान करती है।जिस राष्ट्र में युवा शक्ति ज्यादा होती है उस राष्ट्र को उन्नति के रास्ते से कोई नहीं रोक सकता। भारत उन्ही युवा राष्ट्रों में से एक है, जहाँ की आबादी का लगभग 65 प्रतिशत युवा है। देश की इसी युवा शक्ति के बल पर भारत आने वाले वर्षों में उद्योग, अर्थवयवस्था एवं आध्यत्मिक्ता में सुपर पावर होगा। विश्व के विद्वान् आज भी भारतीय संस्कृति के वसुधैव कुटुंबकम भाव को विश्व संस्कृति के रूप में देख रहें हैं।
हमारा इतिहास इस बात का साक्षी है कि आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व बलिदान करने वाले ज्यादा युवा ही थे। जिन्होंने इस राष्ट्र के लोगों के अंदर क्रांति के बीजों को रोपित किया। देश के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान करने वाले बाल गंगाधर तिलक,रानीलक्ष्मीबाई, मंगलपाण्डे,गोपाल कृष्ण गोखले अपनी युवा अवस्था में ही आजादी की जंग में कूद पड़े थे। ऐसे वीर जवानों की कहानी को कभी भुलाया नहीं जा सकता। भगत सिंह, चंद्र शेखर आजाद, खुदी राम बोस,अशफाक उल्ला खान इत्यादि ऐसे युवा थे जिन्होंने देश वासियों को सुख देने के लिए अपनी जवानी तक को त्याग दिया। 1857 में जब क्रांति की ज्वाला जली थी तब भारत माता की असंख्य संतानों ने उसे रौशन करने के लिए अपनी कुर्बानी दी थी। इसी कड़ी में उन्नीसवीं शताब्दी में विदेशी शासन की दासता से दुखी और शोषित हो रही भारतीय जनता को जिन युवा महापुरुषों ने अंग्रेजों के विरुद्ध संर्घष के लिए प्रोत्साहित किया उनमें स्वामी विवेकानंद जी प्रमुख थे। अपनी ओजस्वी वाणी से उन्होने जन-मानस के मन में स्वतंत्रता का शंखनाद किया। वे केवल आध्यात्मिक पुरूष नहीं थे वरन् वे विचारों और कार्यों से एक क्रांतिकारी संत थे, जिन्होंने अपने देश के युवकों का आह्वान किया था – उठो, जागो और महान बनो I इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस विश्व में भारत ही एकमात्र वो देश है जिसके युवकों में आध्यत्मिक एवं सांस्कृतिक मूल्य,स्वाभिमान, राष्ट्र प्रेम, मानव सेवा एवं देश भक्ति आदि काल से ही चले आ रहें है।लेकिन आज के युवाओं के बदल रहे आदर्शों ने उन्हें पथभ्र्ष्ट कर दिया है।कोई समय था जब हमारे देश में चरित्र बल, शिक्षा एवं परिश्रम को ही सफलता का मापदंड माना जाता था। लेकिन आज सफलता के समीकरण बदल गए हैं। आज उनके नायक कोई देश भक्त या संत महापुरुष नहीं बल्कि फ़िल्मी नायक हैं। इसलिए वो उनकी तरह रातों रात शोहरत प्राप्त करना चाहतेहैं जो मात्र मृगतृष्णा से बढ़कर और कुछ भी नहीं है। जिसके चलते वे न केवल तनाव ग्रसित हो रहे हैं अपितु सामाजिक जिम्मेवारी के स्थान पर ,आर्थिक जिम्मेवारी को ही सब कुछ मानने के लिए मजबूर हो रहे हैंI आज के इस बदलते परिवेश में स्वामी जी के अमृत वचन भटके हुए युवाओं की सोच बदलने में बेहद कारगर साबित हो सकते हैं। स्वामी विवेकानंद जी के जन्मदिन 12 जनवरी को भारत में युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को युवाओं को समर्पित करके उनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे राष्ट्र के निर्माण में अपना अहम योगदान सुनिश्चित कर सके। स्वामी विवेकानंद को भारतीय संस्कृति के शौर्य पुरुष,हिन्दुत्व के प्रणेता, भरतीय अस्मिता के रक्षक, राष्ट्वादियों के अग्रदूत और अनेक विशेषताओं के कारण हम सब उन्हें अपना आदर्श मानते हैं और इसी आदर्श महापुरुष के महान विचारों को जीवन में अपनाने का प्रयास करते हुए, उनको शत्-शत् नमन करना हमारी सांस्कृतिक गरिमा की पहचान है। अतः आज उनकी जयंती के इस शुभ अवसर पर हम सब पुनः उनका स्मरण एवं वंदन करते हुए उनके बताये हुए रास्ते पर चलने का प्रयास करें ताकि एक खुशहाल समाज की सथापना हो सके I
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