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आखिर कब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का बापू का सपना पूरा होगा

कहते  हैं कि भाषा वही जीवित रहती है जिसका प्रयोग जनता करती है और अगर वो भाषा हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक हो तो क्या कहना ! जी हाँ हम बात कर रहे हैं हमारी प्यारी हिंदी भाषा की I  एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह बहुत सरल,  सहज और सुगम भाषा होने के साथ विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है जो हमारे पारम्‍परिक ज्ञान, प्राचीन सभ्‍यता और आधुनिक प्रगति के बीच एक महत्वपूर्ण  सेतु भी है। भारत में ही लगभग 53 करोड़ लोगों की  मातृभाषा हिंदी है जिसमें  43.63% आबादी की पहली भाषा जबकि  13.9 करोड़ (11% से अधिक) लोगों की यह दूसरी भाषा है इन आंकड़ों से यह समझना आसान है कि भारत में लोगों के बीच संवाद का सबसे बेहतर माध्यम हिन्दी ही है शायद यही वजह रही होगी  कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिंदी को जनमानस की भाषा कहते हुए  साल 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही थी। परन्तु स्वतंत्रता  के 76 साल बाद भी  हिंदी राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं पा  सकी  हालाँकि  14 सितंबर, 1949 को  संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। इस निर्णय को  महत्व देने के लिए और हिन्दी के उपयोग को प्रचलित करने के लिए साल 1953 के उपरांत हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। देश का आम नागरिक जानता है कि हिंदी दिवस क्यों मनाया जाता है लेकिन शायद वो यह नहीं जानता कि आज तक हिंदी को हम हमारी राष्ट्रभाषा के तौर पर स्थापित क्यों नहीं कर पाए। 1949  में बेशक कागजी तौर पर  हिंदी राजभाषा बन गयी , लेकिन फली-फूली और समृद्ध होती गई अंग्रेजी भाषा। धीरे-धीरे देश की सरकारी मशीनरी ने हिंदी पर अंग्रेजी को तरजीह देते हुए उसी का चोला ओढ़ लिया। इसके बाद, अंग्रेजी भाषा की सरकारी व्यवस्था आधिकारिक तौर पर पकड़ और मजबूत होती गई और पूरे सिस्टम पर हावी हो गई। इसमें कोई शक नहीं है कि  हिंदी  देश की आत्मा कहलाने वाली, पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में पिरोने वाली, मेल जोल की संस्कृति को बढ़ावा देने वाली  भाषा  है पर  इस सबके बावजूद जिस गौरवपूर्ण भाषा हिंदी को आज पूरे विश्व में आदर और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, अपने ही देश में देशवासियों के उपेक्षापूर्ण रवैए से उसे शर्मसार होना पड़ रहा है। लेकिन यह भी सत्य है कि इन  सबसे विपरीत भारतीय विचार और संस्‍कृति का वाहक होने के कारण  विश्वभर  में करोड़ों की संख्‍या में भारतीय समुदाय के लोग एक संपर्क भाषा के रूप में हिन्‍दी का इस्‍तेमाल कर रहे हैं। इससे अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर हिन्‍दी को एक नई पहचान मिली है। यूनेस्‍को की सात भाषाओं में हिंदी को भी मान्‍यता मिली है। आज संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं में भी हिंदी की गूंज सुनाई देने लगी है।  उम्मीद है कि हिंदी को शीघ्र ही संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा का दर्जा भी प्राप्त हो सकेगा।

हिंदी के इसी महत्व को देखते हुए तकनीकी कंपनियां भी  इस भाषा को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही हैं। सूचना प्रौद्योगिकी , सोशल मीडिया और संचार माध्यमों में हिंदी का प्रयोग निरंतर बढ़ रहा है जोकि ख़ुशी की बात है आज के तकनीकी के युग में वि‍ज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी हिंदी में काम को बढ़ावा देना चाहिए ताकि देश की प्रगति में ग्रामीण जनसंख्‍या सहित सबकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके। हिन्दी भाषा के माध्यम से शिक्षित युवाओं को रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध हो सकें, इस दिशा में निरंतर प्रयास भी जरूरी है।  आज  हिन्दी दिवस के अवसर पर  सभी से आग्रह  है कि वे अपने बोलचाल की भाषा में भी हिंदी का ही उपयोग करें क्यूंकि हिंदी भाषा के प्रसार से पूरे देश में एकता की भावना और मजबूत होगी। इस गंभीर मुददे पर उत्तर ,दक्षिण,पूर्व,पश्चिम की सीमाओं से हटकर  आम जन के साथ-साथ देश के नीति निर्धारकों  को भी गहराई से सोचना होगा कि सारे देश को एक सूत्र में बांधने वाली भाषा हिंदी को राष्ट्भाषा का दर्जा देकर उसे अपने ही घर में सम्मानजनक स्थान दें। यह हम सबका कर्तव्य है  कि हम सबको मिलकर  हिंदी को  राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाकर पूजनीय बापू के सपने को साकार करके भारत माता के  ऋण को चुकाने का प्रयास करें 


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