मौजूदा समय में दुनिया का हर देश विकास की दौड़ में भाग रहा है और इस दौड़ में अपना देश भी कहीं पीछे नहीं है| लेकिन जिस तरह हर सिक्के के दो पहलू होते है,उसी तर्ज पर अपने देश के इस विकास के भी दो पहलू है एक तरफ तो हम तकनीकी और विज्ञान क्षेत्र में आगे बढ़ रहे है, वहीं दूसरी तरफ स्वास्थ्य के ग्राफ में लगातार गिरते जा रहे है नतीजन कई तरह की जानलेवा बीमारियों ने अपने देश को घेर रखा है जिसमें एचआईवी और एड्स एक प्रमुख बीमारी है | भारत में इस वक़्त करीब इक्कीस लाख लोग एचआईवी से पीड़ित है जोकि विश्व में तीसरे स्थान पर है|दुनिया में कहीं न कहीं एचआईवी/एड्स के कारण हर मिनट एक की मौत हो रही है। यह जानकारी यूनाइटेड नेशंस प्रोग्राम ऑन एचआईवी /एड्स (यूएनएड्स) द्वारा जारी नई रिपोर्ट ‘इन डेंजर: ग्लोबल एड्स अपडेट 2022’ में सामने आई है इस रिपोर्ट में जो आंकड़े साझा किए हैं उनके अनुसार अकेले 2021 में एचआईवी संक्रमण के 15 लाख नए मरीज सामने आए थे। वहीं 6.5 लाख लोगों को एड्स की वजह से असमय जान से हाथ धोना पड़ा था। इसका मतलब है कि इस बीमारी के हर रोज 4,000 नए मामले सामने सामने आ रहे हैं, जबकि हर रोज 1,800 लोगों की जान जा रही है।हर साल 1 दिसंबर को देश और दुनियाभर की सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं इस बीमारी को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए कई कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं। एड्स जैसी बीमारी के संक्रमण के खतरों की जानकारी और इससे बचाव तभी संभव है जब जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ समाज की मानसिकता में भी बदलाव आए।
एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनो डिफीसिअन्सी वायरस) एक वायरस है जो आपके शरीर के प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करता है, जिससे हमारे शरीर में किसी भी तरह के संक्रमण से लड़ने में कठिनाई होती है और यही एचआईवी एड्स (एक्वायर्ड इम्यून डेफिशिएन्सी सिंड्रोम) का कारण बनता है।यह स्थिति एचआईवी एड्स की बीमारी कहलाती है। इस संक्रमण के लक्षण कई चरणों में नज़र आते है जिसका आख़िरी चरण एड्स है जो शरीर के लिए बहुत ही घातक स्थिति है। दवाइयों और अच्छी देखभाल के साथ एक एचआईवी पॉज़िटिव इंसान लंबे समय तक स्वास्थ्य की दृष्टि से एक बेहतर जीवन बिता सकता है।लेकिन कहीं न कहीं आज भी एचआईवी पॉजीटिव व्यक्तियों के प्रति भेदभाव की भावना रखी जाती है। यदि उनके प्रति समानता का व्यवहार किया जाए तो स्थिति और भी सुधर सकती है। बात अगर जागरूकता की करें तो लोग जागरूक ज़रूर हुए हैं जिससे एड्स से जुड़े इस मिथक को तोड़ने की कोशिश भी जारी है कि यह साथ खाने, बैठने, छूने, एक ही टॉयलेट के इस्तेमाल से नहीं फैलता। यह वायरस संक्रमित इंसान के ऊपर इस्तेमाल की गई इंजेक्शन या टैटू बनाने वाले सुई के दोबारा किसी स्वस्थ इंसान पर इस्तेमाल किए जाने, संक्रमित व्यक्ति का खून चढ़ाने, असुरक्षित यौन संबंध बनाने के कारण फैलता है। पर यह जागरूकता शहरी क्षेत्र के और मध्यम व उच्च आय वर्ग के लोगों तक ही सीमित है। निम्न वर्ग के लोगों में अभी भी जानकारी का अभाव है। इसलिए अब भी इस वर्ग में एचआईवी पॉजीटिव लोगों की संख्या अधिक है। लोग कारण को जानने के बाद भी सावधानियाँ नहीं बरतते। जिन कारणों से एड्स होता है उससे बचने के बजाए अनदेखा कर जाते हैं। इसमें अधिकांश लोग असुरक्षित यौन संबंध और संक्रमित रक्त के कारण एड्स की चपेट में आते हैं।
भारतीय समाज में आम लोगों की मानसिकता सेक्स को लेकर बड़ी ही संकुचित रही है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश में सेक्स और सुरक्षित सेक्स के बारे में न तो घर पर बताया जाता है ना ही स्कूलों में। यौन शिक्षा के नाम पर बच्चों को महिला और पुरूष शरीर के अंगों के नाम याद करवा दिए जाते हैं इसलिए जब वे बचपन से वयस्कता में प्रवेश करते हैं तो बहुत से युवाओं को रिश्तों और सेक्स के बारे में भ्रमित और गलत जानकारी होती है।अगर शिक्षा का ताल्लुक अपने जीवन के हालात को विवेचनात्मक ढंग से समझने से है तो यौनिकता भी अनिवार्य रूप में शिक्षा का हिस्सा होनी चाहिए। यौनिकता शिक्षा की ज़रूरत युवाओं की ज़िंदगी के मौजूदा यथार्थ से जुड़ी हुई है। बढ़ती उम्र में युवा लोगों के पास यौनिकता के बारे में ढेरों सवाल, असंख्य भ्रम और न जाने कितनी गलतफहमियां होती हैं लेकिन उन्हें कभी इनका जवाब नहीं मिलता क्योंकि यौनिकता के बारे में सटीक जानकारी के स्रोत बहुत कम हैं। इस कारण उनके भीतर सेक्स और यौनिकता से जुड़े मुद्दों के बारे में शर्मिंदगी, भय और अज्ञानता का अहसास बहुत गहरा हो जाता है। इसका एक गंभीर दुष्परिणाम यह भी होता है कि जो युवा जेंडर और यौनिकता के संबंध में तय सामाजिक कायदे-क़ानूनों का उल्लंघन करते हैं, उन्हें शोषण का सामना करना पड़ता है। इसलिए युवाओं के सशक्तिकरण के लिए यौनिकता शिक्षा अनिवार्य है क्यूंकि ये युवाओं को रिश्तों और कामुकता के बारे में निर्णय लेने के लिए सशक्त बनाते हुए एक ऐसी दुनिया को निर्माण होने से रोकती है, जहां लिंग आधारित हिंसा, लिंग असमानता, प्रारंभिक और अनपेक्षित गर्भधारण, एचआईवी और अन्य यौन संचारित संक्रमण अभी भी उत्पन्न होते हैं। एचआईवी/एड्स के लक्षण, समाधान और उपाय के बारे में ही जानकारी का होना ज़रूरी है न कि अन्धविश्वास और अफवाहों से प्रभावित होने की ज़रूरत है| विश्व एड्स दिवस प्रत्येक साल एक विशेष थीम माध्यम से मनाया जाता है और इस साल 2022 का थीम है “कम्युनिटीज मेक द डिफरेंस”। इसके अनुसार इस दिवस को जागरूक समाज की सशक्त भागेदारी सुनिश्चित की गयी है कि वे सब इस भयानक बीमारी के प्रति सबको जागरूकता का पाठ पढ़ा सकें
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