Skip to main content

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 —शिक्षा के नवीनीकरण से परिवर्तन की उम्मीद

 जैसे की हम जानते ही हैं कि शिक्षा  व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिए बहुत आवश्यक है। इसलिए ये ज़रूरी है की शिक्षा की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए वक्त के साथ शिक्षा नीति में भी बदलाव किया जाता रहे  और कहते हैं कि जीवन बदलाव का नियम है और  यदि यह बदलाव सकारात्मक है, तो यह जीवन को एक नई दिशा प्रदान करता है। जिस तरह से एक जगह रुका हुआ पानी बदबू मारने लगता है उसी तरह से एक पुरानी पद्धति चाहे वो शिक्षा व्यवस्था से ही सम्बंधित हो, से भी पढाई करने पर बच्चों को शिक्षा से लाभ मिलना बंद हो जाता है इसी सकारात्मक बदलाव की और अग्रसर होते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय  शिक्षा नीति 2020 को लागू  करके शिक्षा के नवीनीकरण की ओर पहल की  है जो कि  निःसंदेह एक सराहनीय कदम है, जो बच्चो के मानसिक विकास को बढ़ावा देगा साथ ही अब यह विषयो को रटने की पद्धिति का त्याग कर उसे समझने के सिद्धांत पर कार्य करेगा। राष्ट्रीय  शिक्षा नीति 2020 को   भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई 2020 को घोषित किया गया। यह नीति अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। इसका मूल उद्देश्य विद्यार्थियों  में  क्रियात्मक  प्रवर्ति को जगाना है, जहां कोई भी बच्चा अपनी क्षमताओं को समझकर उसके अनुसार विषयो का चयन कर सकता है। हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था मे इस बदलाव की बहुत आवश्यकता थी और अगर इस शिक्षा नीति को  सही तरीके से लागू कर दिया गया  तो निश्चित ही भारत की  शिक्षा व्यवस्था दुनिया की  सर्वोत्तम व्यवस्था  बन जाएगी । अगर हम  स्कूली शिक्षा की बात करें  तो इसके मूलभूत ढांचे में ही एक बड़ा परिवर्तन आया है। 10+2 पर आधारित हमारी स्कूली शिक्षा प्रणाली को 5+3+3+4 के रूप में बदला गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत आने वाला वाला पहला चरण फाउंडेशन स्टेज / मूलभूत चरण का है जिसकी अवधि  5 वर्ष की होगी और जिसमें  पूर्व प्राथमिक और ग्रेड 1 व 2 शामिल होंगी है। इसके  तहत अब प्रारंभिक बाल्यकाल अवस्था से ही बच्चों को आगे आने वाली शिक्षा दीक्षा के लिए तैयार किया जाएगा। 5 साल से कम आयु के बच्चों के लिए “बालवाटिका ” का प्रावधान भी किया गया है। यहाँ खेल कूद के साथ-साथ संख्या ज्ञान आदि दे दिया जाएगा। साथ ही कक्षा दो तक कोई भी परीक्षा नहीं ली जाएगी। इस तरह बच्चों को बिना दबाव के शिक्षित किया जाएगा इस नीति का दूसरा  चरण प्रिपरेटरी स्टेज नाम से जाना जायेगा, जहाँ कक्षा 3 से 5 तक के बच्चों को आगे के पाठ्यक्रम के लिए तैयार किया जाएगा। इन कक्षाओं के छात्र अपनी मातृभाषा तथा स्थानीय भाषा में भी पढाई कर सकते हैं। यह कदम यही सोच के उठाया गया है की अपनी भाषा में ज्ञान अर्जित करना ज्यादा रोचक व सरल होता है। इसके चलते विद्यार्थियों को दिया ज्ञान ज्यादा प्रभावी और कारगर होता है। अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता को ख़त्म कर दिया गया है और इसे एक विषय के रूप में अब भी पढ़ाया जाएगा। इस चरण में छात्रों को संख्यात्मक कौशल व भाषा का मूलभूत ज्ञान दिया जाएगा। मिडिल स्टेज में कक्षा 6 से 8 तक के विद्यार्थी आएँगे जिनकी उम्र 11 से 14 वर्ष के बीच हो सकती है। इस कक्षा से अब कंप्यूटर ज्ञान और कोडिंग की जानकारी दी जाने लगेगी। सभी को आवश्यक रूप से रूचि के अनुसार व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाएगा और उसके बाद इंटर्नशिप भी करवाई जाएगी। इस चरण में बच्चों को बाकी विषयों  के साथ कोई भी एक भारतीय भाषा /क्षेत्रीय भाषा  का भी आवश्यक रूप से ज्ञान दिया जाएगा। आखरी  सेकेंडरी स्टेज में कक्षा 9 से लेकर 12 तक के छात्र आएँगे जिनकी उम्र सीमा 14 से 18 वर्ष हो सकती है।  अब कक्षा 9 से 12 तक के विद्यार्थियों को अपनी परीक्षा सेमेस्टर/ टर्म वाइज देनी पड़ेगी । सालभर में दो परीक्षाएं होने से छात्रों को अध्ययनरत रहना होगा। अब छात्रों को आर्ट्स साइंस और कॉमर्स में से किसी एक स्ट्रीम को ही पढ़ने की बाध्यता ख़त्म कर दी गयी है। छात्र चाहें तो साइंस, कॉमर्स के विषय के साथ आर्ट्स के विषय भी ले सकते हैं। हालंकि इसके लिए विषयों के पूल बनाये जाने की भी व्यवस्था की जाएगी ।विद्यार्थियों का मूल्यांकन अब पहले की तरह नहीं किया जाएगा। किसी भी छात्र को फाइनल रिपोर्ट कार्ड पर अंक देते हुए उसके सम्पूर्ण प्रदर्शन को देखा जाएगा। उसका व्यवहार, उसकी अन्य  सह पाठ्यक्रम गतिविधियां में भागीदारी व प्रदर्शन, तथा उसकी मानसिक क्षमताओं का भी ध्यान रखा जाएगा। अब से रिपोर्ट कार्ड 360 डिग्री मूल्यांकन के आधार पर बनेगा, जिसमे विषय पढ़ाने वाले अध्यापक के साथ साथ छात्र अपना व अपने सहपाठियों का विश्लेषण कर खुद को और सहपाठियों को भी अंक देंगे। नई शिक्षा नीति में जो प्रावधान किए गए हैं, उनसे निश्चित रूप से भारत में शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन की उम्मीद है। आज भारतीय शिक्षा व्यवस्था के समक्ष कई तरह की चुनौतियां हैं। इन सबसे एक साथ निपटना बहुत मुश्किल काम है, लेकिन नई शिक्षा नीति से काफी उम्मीद जगी है। एक लंबे विमर्श के बाद तैयार इस नीति से हम न केवल प्राथमिक और उच्च शिक्षा को ठीक करने में सक्षम होंगे, बल्कि एक ऐसे भारत के निर्माण की ओर भी अग्रसर हो सकेंगे जिससे आत्मनिर्भरता का हमारा सपना साकार होगा उम्मीद है कि इस नई शिक्षा नीति से देश में रोजगार पूरक  शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा और रटकर पढ़ने की संस्कृति से बच्चों को छुटकारा मिलेगा. इस नीति के प्रारूप को सही तरीके से क्रियान्वित करने की सबसे बड़ी चुनौती अब हमारे सामने है क्यूंकि इन सारी कवायदों का परिणाम इसे लागू करने की प्रक्रिया से ही  जुड़े होंगे। 

Comments

Popular posts from this blog

आखिर कब हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का बापू का सपना पूरा होगा

कहते  हैं कि भाषा वही जीवित रहती है जिसका प्रयोग जनता करती है और अगर वो भाषा हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक हो तो क्या कहना ! जी हाँ हम बात कर रहे हैं हमारी प्यारी हिंदी भाषा की I  एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है बल्कि यह बहुत सरल,  सहज और सुगम भाषा होने के साथ विश्व में तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है जो हमारे पारम्‍परिक ज्ञान, प्राचीन सभ्‍यता और आधुनिक प्रगति के बीच एक महत्वपूर्ण  सेतु भी है। भारत में ही लगभग 53 करोड़ लोगों की  मातृभाषा हिंदी है जिसमें  43.63% आबादी की पहली भाषा जबकि  13.9 करोड़ (11% से अधिक) लोगों की यह दूसरी भाषा है इन आंकड़ों से यह समझना आसान है कि भारत में लोगों के बीच संवाद का सबसे बेहतर माध्यम हिन्दी ही है शायद यही वजह रही होगी  कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिंदी को जनमानस की भाषा कहते हुए  साल 1918 में हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की बात कही थी। परन्तु स्वतंत्रता  के 76 साल बाद भी  हिंदी राष्ट्रभाषा का दर्ज...

प्रकृति के लिए अभिशाप बन चुका है प्लास्टिक

  विश्व पर्यावरण दिवस वैश्विक स्तर पर पर्यावरण और उसके विभिन्न घटकों के संरक्षण के लिए आयोजित किया जाने वाला सबसे बड़ा अभियान है, जिसका  लक्ष्य पृथ्वी वासियों को पर्यावरण की महत्ता, वातावरण को स्वच्छ बनाना  एवं उसके संरक्षण के लिए जागरूक बनाना है।  यह हर वर्ष 5 जून को 100 से ज्यादा देशों में मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा के द्वारा मानव पर्यावरण के संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन से 1972 में हुई थी I इस दिवस पर स्कूल, कॉलेज व अन्य स्थानों पर विभिन्न तरह की पर्यावरण संबंधी गतिविधियां जैसे  निबंध, भाषण, क्विज, कला प्रतियोगिता, बैनर प्रदर्शन, नुक्कड़-नाटक, रैली  आदि के जरिए लोगों को बृहद रूप से वृक्षारोपण, प्रकृति प्रेम, वृक्ष कटाई से रोकने के लिए जागरूक किया जाता है प्रकृति के प्रति सकारात्मक रवैये को लेकर लोगों को जागरूक किया जाता हैI साथ ही साथ उन्हें आसपास को साफ सुथरा रखने, पानी की बचत, बिजली का कम उपयोग करने उसके जगह पर सौर उर्जा  का उपयोग करने, जंगली जीवन की सुरक्षा आदि के लिए संकल्प भी दिलाया जाता है ताकि हमारी प्राकृतिक सुंदरता सदैव बर...

रिश्तों की बुनियाद कमजोर करती सोशल मीडिया से दोस्ती

  हमारा देश प्रगति के मार्ग पर है और इसमें   इंटरनेट का महत्व बहुत अधिक है  अब हर काम को घर से ही इंटरनेट के जरिए किया जा सकता है फिर हमारा सामाजिक क्रिया-कलाप इसमें पीछे कैसे रह सकता है । सोशल मीडिया के  आगमन से हम  देश-विदेश के लोगों से जुड़ गए हैं ।आजकल जहाँ सोशल मीडिया बहुत ही सार्थक लगने लगा है तो वहीं इसके दुष्परिणाम भी बहुत सामने आ रहे हैं । चूंकि सोशल मीडिया हमें देश-विदेश से जोड़ रहा है । इसलिए हमारी संस्कृति पर विदेशी प्रभाव पड़ता जा रहा है ।खास कर बच्चे और युवा वर्ग विदेशी संस्कृति की ओर आकर्षित हो रहे हैं । जिससे उनके विचार, व्यवहार, पहनावे-ओढ़ावे में तेजी से बदलाव देखा जा रहा है । आज युवा पैसा कमाने के लिए गलत तरीके अपनाने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं आज सोशल मीडिया का दुरूपयोग एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा बन चुका है जो कि एक नासूर की तरह समाज और संस्कृति को खोखला करता जा रहा है जहां ना रिश्तों की परवाह है , ना किसी की इज्जत की I चंडीगढ़ की एक निजि विश्व-विद्यालय में हुआ  प्रकरण भी भविष्य के ऐसे भयावह  समाज का आईना दिखा रहा  है I जब से स्मार...