किसी भी देश को चलाने के लिए संविधान जरूरी है। यह न केवल सरकार की रचना करने में सहायक है बल्कि मनमाने शासन को रोकने में अत्यंत भी अपनी अहम भूमिका निभाता है यह सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के साथ साथ उनके मौलिक कर्तव्यों के बारे में भी बताता है। सत्ता में बैठे लोग जिनका मकसद जनता की सेवा करना है, वे संविधान के प्रति जवाबदेह हैं, जबकि इसकी रक्षा के लिए देश के सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार दिए गए हैं। ऐसे में संविधान दिवस के बारे में जानना हर नागरिक के लिए बेहद ज़रूरी है क्यूंकि समाज में आज भी ऐसे कई वर्ग हैं, जो संविधान में दिए नागरिक अधिकारों से अनजान है। इसलिए जरूरत है कि ये लोग अपने संविधान के बारे में जानें और अपने अधिकारों की बात करें, ताकि हम समान तरीके से आगे बढ़ें और असमानता को दूर किया जा सके।
भारतीय लोकतंत्र में आज का दिन जितना पावन है, उतना ही महत्वपूर्ण भी। हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की आत्मा अगर किसी को कहा जा सकता है तो वो हमारा संविधान है। इस आत्मा रूपी लिखित ग्रंथ को वैसे तो 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था, पर इसे 26 नवंबर 1949 को स्वीकार किया जाना बहुत ऐतिसाहिक पल था। इसी दिन भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ था, इसलिए 26 नवंबर का दिन ही संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन एक राष्ट्र के तौर पर हमने तय किया था कि अब आगे हमारी दिशा संविधान के उन निर्देशों एवं नियमों के तहत होगी जिसका एक-एक शब्द हमारे लिए पवित्र है, पूजनीय है।
अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने आजाद और समृद्ध भारत का सपना देखा था, सामाजिक व आर्थिक न्याय पर आधारित समतामूलक समाज के निर्माण का सपना देखा था। इसके लिए उन्होंने कष्ट सहे और बलिदान दिया। एक लंबे संघर्ष के बाद हमें आजादी मिली। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत जैसे विशाल व विविधतापूर्ण देश के लिए यह एक बड़ी चुनौती थी कि लोकतांत्रिक व्यवस्था को कायम रखते हुए कैसे देशवासियों के सामाजिक-आर्थिक जीवन में समृद्धि लाई जा सके। संविधान निर्माण के समय हमारे संविधान निर्माताओं के समक्ष तीन मुख्य उद्देश्य थे - राष्ट्र की एकता और स्थिरता को सुरक्षित रखना, व्यक्तियों की निजी स्वतंत्रता और कानून के शासन को सुनिश्चित करना तथा ऐसी संस्थाओं के विकास के लिए जमीन तैयार करना जो आर्थिक और सामाजिक समानता के दायरे को और व्यापक बनाएं।
भारत की स्वतंत्रता के बाद जब करोड़ों लोग नई उम्मीदों के साथ आगे बढ़ने का सपना देख रहे हों, एक ऐसा देश जिसमें एक दर्जन से ज्यादा पंथ हों, सौ से ज्यादा भाषाएं हों, सत्रह सौ से ज्यादा बोलियां हों, शहर-गांव-कस्बों और जंगलों तक में लोग रहते हों, जिनकी अपनी अपनी आस्थाएं हों, उन सबको एक मंच पर लाना और देश के सामने एक ऐसा संविधान प्रस्तुत करना, जो सभी को स्वीकार्य हो, बहुत मुश्किल काम था। इसलिए आज का दिन देश के संविधान निर्माताओं को नमन करने का भी दिन है।
संविधान की शक्ति को समझते हुए संविधान सभा के अंतरिम चेयरमैन श्री सचिदानंद सिन्हा जी ने कहा था-
“मानव द्वारा रचित अगर किसी रचना को अमर कहा जा सकता है तो वो भारत का संविधान है” क्यूंकि ऐसा कोई विषय नहीं, जिसकी व्याख्या, जिस पर दिशा-निर्देश हमें भारतीय संविधान में ना मिलते हों।
हमारा संविधान जितना जीवंत है, उतना ही संवेदनशील भी। हमारा संविधान जितना जवाबदेह है, उतना ही सक्षम भी। खुद बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर ने संविधान के बारे में कहा था कि “ ये व्यावहारिक और लचीला है और शांति हो या युद्ध का समय, इसमें देश को एकजुट रखने की ताकत है”।उनके अनुसार "संविधान केवल वकीलों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक माध्यम है।"
भारत का संविधान भारत का सबसे बड़ा कानून है, जो सरकारी संस्थानों की मौलिक राजनीतिक संहिता, संरचना, प्रक्रियाओं, शक्तियों और कर्तव्यों का सीमांकन करता है और मौलिक अधिकारों, निर्देशक सिद्धांतों और नागरिकों के कर्तव्यों को निर्धारित करता है। हमारे संविधान निर्माताओं ने अपने अनुभव, ज्ञान, अपनी सोच तथा देश की जनता से जुड़ाव के चलते न केवल इन लक्ष्यों को सिद्ध किया बल्कि हमें एक ऐसा संविधान दिया जो अपने समय का सबसे प्रगतिशील एवं विकास उन्मुखी संविधान है।
इसलिए आज हमारे संविधान निर्माताओं के प्रति आभार व्यक्त करने और उनके सपनों के भारत के निर्माण के लिए हमारी प्रतिबद्धता को दोहराने का दिन है। आओ संविधान दिवस पर हम सब प्रण लें कि एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक बनें और उन सब मर्यादाओं का पालन करें जिसकी उम्मीद हमारा अभिभावक, हमारा संविधान हमसे करता है और परिवार के सदस्य की भांति हम एक दूसरे को मजबूत करने के लिए, एक दूसरे का सहयोग करने के लिए काम करें जिससे कि हमारा देश दुनिया के अग्रणी देशों की कतार में सबसे आगे खड़ा हो I
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