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भारत की एकता के सूत्रधार और आधार स्तंभ --- लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल

जब किसी समाज में सारे व्यक्ति किसी निर्दिष्ट भौगोलिक सीमा के अन्दर अपने पारस्परिक भेद-भावों को भुलाकर सामूहीकरण की भावना से प्रेरित होते हुए एकता के सूत्र में बंध जाते हैं तो एक देश का निर्माण होता है I किसी भी  देश की स्थिरता को बनाए रखने में राष्ट्रीय एकीकरण की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता जिसके माध्यम से सांप्रदायिक सौहार्द  एवं  संपूर्ण विकास संभव होता  है। राष्ट्रीय एकीकरण न केवल  जातिवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद आदि से लड़ता है अपितु राष्ट्र के प्रति वफादारी और भाईचारे की भावना में सुधार करने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता  है I इसी राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी सरदार वल्लभभाई पटेल थे जिन्होंने अपनी संगठन कुशलता, राजनीति सत्ता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति अटूट निष्ठा के चलते  जिस अदम्य उत्साह एवं असीम शक्ति से नवजात गणराज्य की प्रारंभिक कठिनाइयों का समाधान किया, उसके कारण विश्व के राजनीतिक मानचित्र में उन्होंने अमिट स्थान बना लिया I देश की आजादी के संघर्ष में उन्होंने जितना योगदान दिया, उससे ज्यादा योगदान उन्होंने स्वतंत्र भारत को एक करने में दिया । 

स्वतंत्र भारत का गृहमंत्री बनने के बाद भारतीय रियासतों के विलय की जिम्मेदारी उनको ही सौंपी गई थी I उन्होंने अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए छह सौ छोटी-बड़ी रियासतों का भारत में विलय करवा कर आजाद भारत को एक विशाल राष्ट्र बनाने में उल्लेखनीय योगदान दियाI इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके  द्वारा 562 रियासतों का एकीकरण विश्व इतिहास का एक अनोखा कार्य था I यह भारत जैसे विशाल देश  की ऐसी  रक्तहीन क्रांति थी जिसने हिन्दू, मुस्लिम, जैन, ईसाई, पारसी तथा सिक्ख आदि विभिन्न धर्मों तथा जातियों एवं सम्प्रदायों के लोगों को  उनके परस्पर विरोधी विचारों, सिद्धान्तों ,भाषाओं, रहन-सहन के ढंगों, आचार -विचार तथा वस्त्रों एवं खाद्यानो आदि बहुत सी बातों में विभिन्नता के होते हुए भी जीवन की एकता के सूत्र में पिरो दिया I महात्मा गांधी ने सरदार पटेल को इन रियासतों के विलय के बारे में लिखा था, "रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी, जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे." और उनकी इस नीतिगत दृढ़ता के लिए ही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन्हें सरदार और लौह पुरुष की उपाधि दी थीI सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर, 1875 में नाडियाड गुजरात में हुआ था। सरदार पटेल गणतंत्र भारत के संस्थापकों में से एक हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में भारत के उप प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जैसी अहम जिम्मेदारियों का निर्वहन किया है। इसलिए 31 अक्टूबर के दिन उनकी बहुमूल्य विरासत का जश्न मनाने के लिए देश उनकी जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाता है। उनका निधन 15 दिसंबर, 1950 को मुंबई में हुआ था l उन्हें मरणोपरांत वर्ष 1991 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारतरत्न दिया गयाI   गुजरात के केवड़ि‍या में स्थित उनकी विश्‍व की सबसे ऊंची प्रतिमा (182 मीटर ) जिसे ‘स्‍टैच्‍यू ऑफ यूनिटी’ के नाम से जाना जाता जाता है यह दर्शाती है कि  जब भी राष्ट्र को एकसूत्र में पिरोने की बात आएगी तो सबसे पहले सरदार वल्लभभाई पटेल का नाम लिया जाएगा। हमें गर्व है कि हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहाँ विविधता में भी एकता है परन्तु प्राचीन युग में जिस तरह भारतीय संस्कृति अन्य संस्कृतियों को अपने में आसानी  से मिला लेती थी वो  गुण अब ख़तम होने की कगार पर है जिसके कारण संस्कृति की एकता के विषय में रोजाना  मतभेद बढ़ते जा रहे हैं और परिणामस्वरूप अब एक राज्य के निवासी दूसरे राज्य के निवासियों की भाषाओं तथा रीति-रिवाजों एवं परम्पराओं को भी सहन नहीं कर रहे हैं। संस्कृति की संकीर्णता के साथ-साथ अब देश में और भी ऐसी विघटनकारी प्रविर्तियाँ विकसित हो गई है जिनके कारण राष्ट्रीय एकता एक जटिल समस्या बन गई है। देश को गुलामी, साम्प्रदायिक झगड़ों, दंगों से बचाने के लिए देश में राष्ट्रीय एकता का होना अति आवश्यक है। 200 साल से भी अधिक की गुलामी के पश्चात प्राप्त स्वतंत्रता का हमें दिल से सम्मान करना चाहिए तथा किसी भी कारणवश राष्ट्रीय एकता पर उंगली उठ सके, ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए।

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