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आपदा प्रबंधन में पंचायत की भूमिका महत्वपूर्ण

 विश्व में पर्यावरण के स्तरों में गिरावट, मौसम में बदलाव और अनियोजित विकास में वृद्धि के कारण, आपदाओं की घटनाएं लगातार बढ़ रही  हैं। जिसके चलते पिछले कुछ वर्षों में  आपदा प्रबंधन को बहुत महत्व मिला है। विश्व के सर्वाधिक आपदा-संभावित देशों में से एक भारत में तो इसका महत्त्व और भी अधिक हो जाता है  जहाँ  प्रतिवर्ष बाढ़, भूस्खलन, सूखा और तूफान आने की आशंका के चलते नागरिकों का जागरूक रहना अति आवश्यक है । आपदा कभी किसी को बता कर नहीं आती ये तो  अचानक घटने वाली ऐसे  घटना है जिससे सामान्य जन-जीवन अस्त-व्यस्त होने के साथ साथ  जान-माल का इतना भारी नुकसान हो जाता है कि जीवन को फिर से पटरी पर लाने के लिए विशेष सामजिक एवं आर्थिक व्यवस्था और सघन प्रयास की आवश्यकता होती है। ऐसी प्राकृतिक आपदाओं और विपत्तियों में कुशल आपदा प्रबंधन द्वारा हम  न केवल सँभलना सीखते  हैं अपितु  निश्चित रूप से उससे उत्पन्न प्रभावों को ज़रूर कम कर सकते  हैं। आपदाओं के कारण जानवरों और मनुष्यों के संभावित जीवन खतरे को कम करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय आपदा न्यूनीकरण दिवस की शुरुआत 1989 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा जोखिम-जागरूकता और आपदा न्यूनीकरण की वैश्विक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। हर वर्ष 13 अक्टूबर को आयोजित किया जाने वाला यह दिन दुनिया भर के लोगों  और समुदाय को आपदाओं के प्रति अपने जोखिम को कम करने  हेतु एवं  उनके सामने आने वाले जोखिमों पर लगाम लगाने के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाता है ।

प्रौद्योगिकी की उन्नति के साथ-साथ आपदाओं के प्रभाव में भी बदलाव आया है। लोग सभी प्रकार की आपदाओं जैसे वनों की आग, भूकंप, सूखे, बाढ़, दुर्घटना, चक्रवात, भूस्खलन, विमान दुर्घटना जैसों के आदी होते जा रहे हैं फलस्वरूप जब कोई आपदा आ जाती है तो तभी लोगों एवं सरकारों  द्वारा इस ओर की गई तैयारियों की असलियत पता चलती है। आपदा की स्थिति में हालातों को काबू में करने के लिए उचित तैयारी आवश्यक है। आपदा के दौरान, उससे पहले और बाद में पड़ने वाले प्रभावों  को कम करने के लिए  आपदा प्रबंधन द्वारा उठाये गए ठोस प्रयासों  से निश्चित तौर पर कम किया जा सकता है I यह बहुत महत्वपूर्ण है कि लोग किसी भी आपदा की स्थिति में ना डरें और बुद्धिमानी एवं संयम  से काम लें । प्राकृतिक आपदाओं जैसी आपातकालीन स्थितियों के दौरान बच्चों की दशा बहुत संवेदनशील होती है और उन पर  पर गहरा असर छोड़ती हैं।  इसलिए  शिक्षण संस्थानों के माध्यम से उनको आपदा के दौरान उठाये जाने वाले विभिन्न क़दमों को जानने के लिए समय समय पर मॉक ड्रिल करवाना अति आवश्यक है I इसके अलावा आपदा के समय जन अपेक्षाओं का सामना सबसे पहले ग्राम पंचायत को ही करना होता है। इसलिए आपदा प्रबन्धन एवं संकट समाधान के लिए ग्राम  पंचायतों को अपनी योजना बनाकर स्वयं-सहायता एवं स्थानीय सहायता  के आधार पर जरुरी कदम उठाने चाहिएं। प्रशिक्षण और ‘हरदम तैयार’ वाली स्थिति पर अधिक ध्यान देना चहिए। । उन्हें संकट से जूझती जनता की अपेक्षाओं पर भी खरा उतरने के लिए   एहतियात, रोकथाम के उपाय, पूर्वं तैयारी,राहत ,बचाव एवं  पुनर्वास पर ध्यान देना चाहिए I पहले भी गाँवों में लोग  सामाजिक सहयोग से इस तरह की व्यवस्था करते थे। बरसात के समय सूखी लकड़ी आदि की व्यवस्था, अचार, तैयार नाश्ते का सामान, बेसन, हल्की भोजन सामग्री, दियासलाई, बड़ी, पापड़ आदि की व्यवस्था पहले से ही करके रखते थे जिससे कि बरसात या बाढ़ आने पर कोई परेशानी न हो। यहाँ तक कि ऊँची जगहों पर बने मकान में रहने वाले लोग अपने दालान आदि में नीची जगहों पर रहने वाले लोगों के रहने के लिए व्यवस्था करते थे और स्वविवेक का परिचय देते थे । ठीक उसी तरह, आपदा प्रंबधन में समाज और  इस प्रकार समुदाय के लिए बड़े पैमाने पर यथाशीघ्र सारी व्यवस्था करना पंचायत की एक प्रमुख जिम्मेदारी है।आपदा प्रबंधन के मुख्यतः तीन  भाग हैं, पूर्व तैयारी, आपदा घटित होने के दौरान कार्यवाही तथा आपदा घटित होने के बाद की तैयारी और कार्यवाही। तीनों   स्थितियों में आपदा प्रंबधन का मूल आधार होता है; सहयोग, सहभागिता एवं संपर्क। इसमें एक भी तत्व की कमी से आपदा प्रबन्धन अधूरा एवं असफल रहता है। इसलिए आज देश के हर नागरिक को जागरूक होना पड़ेगा ताकि भविष्य में  घटित होने वाली ऐसी आपदाओं से जान-माल के नुक्सान को कम किया जा सके I 

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