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कुल का गौरव, राष्ट्र की अनमोल धरोहर एवं सभ्य समाज की जननी –बेटियां

 बालिकाएं मानवता का वह हिस्सा हैं जो समाज में सभी सकारात्मकता की वाहक हैं,जिनकी मात्र उपस्थिति माहौल को स्वयं ही शिष्टता, सभ्यता और सुखदता से भर देती हैं। भारत एक ऐसा देश है जो अपनी संस्कृति, अपने रीति रिवाजों के लिये जाना जाता है। यहां के लोग अपनी धरती को अपनी मां के समान समझतेहुए उसे “भारत माता” के नाम से पुकारते हैं । बेटियों को सम्मान देने के मामले में यहां के लोग आज भी पीछे नहीं है। वे बेटियों को शक्ति का स्वरुप (गंगा, गीता, गायत्री, लक्ष्मी, सरस्वती) मानते हैं यहाँ बेटियां मानव कुल का गौरव, राष्ट्र की अनमोल धरोहर एवं सभ्य समाज की जननी कहलाती हैं। आज देश की बेटियां हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं. पहले जहां बेटियों के पैदा होने पर भी उन्हें बाल विवाह जैसे कुप्रथा में झोंक दिया जाता था, वहीं आज बेटी होने पर लोग गर्व करते हैं.

तभी तो जो कल तक ये मानते थे कि बेटों से वंश चलता है़ वो भी आज की तारीख में मानने लगे हैं कि हमारी बेटियां भी इसमें अब पीछे नहीं रहीं। देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीं,कल्पना चावला, मेरिकॉम, पी टी उषा, पी वी सिन्धु, या फिर इंदिरा नुई हों ये सब तो महज उदाहरण भर है, जिसे समझने की जरुरत है। सब जानते हैं कि सामाजिक संतुलन को बनाए रखने के लिए पुरुष और महिला दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। हालाँकि, महिलाओं का योगदान नौ महीने अधिक है, जिनकी तुलना दुनिया की किसी भी चीज़ से नहीं की जा सकती है। फिर भी आज भारतीय समाज में महिलाओं को वास्तविक बराबरी का दर्जा नहीं मिल सका है। इस बेहद गंभीर मुद्दे पर चिंता व्यक्त करते हुए एक निजी संस्था के द्वारा “क्योंकि मैं लड़की हूं” मुहिम की शुरुआत साल 2008 में शुरू की गई। इस मुहिम में दुनिया का वह नजरिया समाज की आंखों के सामने लाया गया जिसने इस मुहिम को पूरे विश्व में प्रसिद्ध कर दिया। साल 2011 में कनाडा सरकार के द्वारा इस मुहिम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित करने के लिए राष्ट्र संघ में पेश किया गया। जिसके बाद 11 अक्टूबर 2011 को वह दिन चुना गया जहां से विश्व के 50 से अधिक देशों में अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर विभिन्न प्रकार के समारोह के जरिए स्त्री के प्रति लोगों को जागरूक करने का प्रयास शुरू किया गया।संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 19 अक्टूबर 2011 को 11 अक्टूबर को बालिका के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया। इस दिन पर परिवार, समाज और देश के लिए बालिकाओं के महत्व को दर्शाया जाता है. इसके साथ ही यह संदेश दिया जाता है कि बालिकाओं की क्षमताओं और शक्तियों को पहचान कर उनके लिए दिल खोलकर अवसर मुहैया कराने चाहिए. अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने के पीछे उद्देश्य है कि दुनियाभर की बालिकाओं के आवाज का सशक्त करना, महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों और उनके अधिकारों के संरक्षण के बारे में जागरूकता पैदा करना है I यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लिंग-आधारित चुनौतियों को समाप्त करता है, जिसका सामना दुनिया भर में लड़कियां करती हैं, जिसमें बाल विवाह, उनके प्रति भेदभाव और हिंसा शामिल है I क्यूंकि नारी मां-बहन-बेटी और ममता की धरोहर है। इसके अनेक रुप और हर रुप में खुद को जिम्मेदारी के साथ स्थापित करना किसी चुनौती से कम नहीं है। अगर विकास और समृद्धि को गंभीरता से लेना है, तो महिलाओं की हालत बेहतर करनी होगी और यदि न्याय चाहिए तो केवल आदर्श भरी बातें बंद करके ,आव़ाज भी उठानी होगी Iमूक दर्शक की श्रेणी से बाहर निकल कर अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता ,जीवन के अधिकार के लिए वास्तव में जगह बनानी होगी I जिस तरह एक मजबूत इमारत का निर्माण उसकी मजबूत नींव पर निर्भर करता है, उसी प्रकार एक मजबूत राष्ट्र उसके सभी शिक्षित नागरिकों और जानकार लोगों पर निर्भर करता है। अगर हम अपने आधे से अधिक नागरिकों को उनके व्यक्तिगत विकास से दूर रखते हैं तो हमने पहले से ही एक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ने की हमारी योजना को विफल करना शुरू कर देते हैं । इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस का थीम “अब हमारा समय है – हमारे अधिकार हमारा भविष्य” यह दर्शाता है कि आने वाला समय बालिकाओं का होगा हर क्षेत्र में वो आगे बढेंगी और अगर कोई लड़की पूर्ण समय के लिए काम करे या थोड़ी देर के लिए घर का काम करे वह अपनी शिक्षा की मदद से पूर्ण क्षमताओं सहित अपने कार्य को पूरा करने में सक्षम हो सकती है। तो आइए, इस अवसर पर बालिकाओं को मानसिक, शारीरिक व व्यावहारिक रूप से सशक्त बनाने तथा लिंग आधारित भेदभाव को जड़ से खत्म करने का संकल्प लें।

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