15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर हिन्दुस्तान में घर घर लहराता तिरंगा, हमें स्वतंत्र भारत का नागरिक होने का अहसास करा रहा है। स्वतंत्रता दिवस हमारा राष्ट्रीय पर्व है, हमारा हिन्दुस्तान 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों से स्वतंत्र हुआ था। जरा कल्पना करिए उन लम्हों की जब इस देश की जनता ने आजादी की पहली साँस ली होगी | खुली हवा में अपने अरमानों के पंख फ़ैलाने का सुखद एहसास कितना मनोरम रहा होगा| हर तरफ बस आजादी का जयघोष हो रहा होगा | न जाने कितने बरसों से अंग्रेजों की गुलामी को झेलते हुए जो सपना हम आजादी का देख रहे थे उसका अचानक सच हो जाना कितना आनंदित कर देने वाला होगा | हम गुलामी के जंजीरों से मुक्त होकर अपने सपनों का संसार रचने को पूर्णतया स्वतंत्र हो चुके थे | भारत ने इसके लिए एक लम्बी और कठिन यात्रा तय की जिसमें अनेक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय अभियान शामिल थे और इसके दो मुख्य हथियार थे–सत्य-अहिंसा और क्रांति का मार्ग। जिसकी शुरुआत सन् 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के यज्ञ के सूत्रधार बने महर्षि दयानन्द सरस्वती ने की जबकि इस यज्ञ को पहली आहुति मंगल पांडे ने दी । देखते ही देखते यह यज्ञ चारों ओर फैल गया | झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्यां टोपे और नाना राव जैसे योद्धाओं ने इस स्वतंत्रता के यज्ञ में अपने रक्त की आहुति दी। द्वितीय चरण में ‘सरफरोशी की तमन्ना’ लिए रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव आदि देश के लिए शहीद हो गए। तिलक ने ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’ का उद्घोष किया व सुभाष चंद्र बोस ने ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का मंत्र दिया। अहिंसा और सहयोग का अस्त्र लेकर महात्मा गांधी और गुलामी की बेड़ियां तोड़ने को तत्पर लौह पुरुष सरदार पटेल के प्रयासों एवम् भारत के प्रत्येक जाति, धर्म, सम्प्रदाय तथा मज़हब के लाखों भारतवासियों ने लाखों कुर्बानियां देकर यह स्वतंत्रता प्राप्त की थी। आज पूरे देश में आजादी का जश्न, अमृत महोत्सव के रूप में शुरू हो चुका है और यह जश्न होना भी चाहिए, क्योंकि लाखों यत्न के बाद हमें यह आजादी मिली है
आजादी कहने को तो एक शब्द है पर प्रत्यक्ष में यह हमें कितनी खुशी देता है इसे तो सिर्फ गुलामी में पड़कर ही जाना जा सकता है । कितने भय और किन किन रास्तों पर चलकर हमने इस प्रसन्नता को पाया है इसे तो लोग शायद अब भूलने भी लगे हैं खैर जो भी हो हम भारत का स्वतंत्रता दिवस बड़ी धूमधाम से मनाते हैं पर इन इतने वर्षों बाद भी क्या वास्तव में स्वतंत्रता के मायने वहीँ हैं जो उस समय में थे ? शायद नहीं I क्यूंकि आजादी के मायने हर पीढ़ी के साथ बदल रहे हैं एक सवाल जो हमेशा जेहन में बार-बार उठता है कि क्या इतने सालों बाद हम वाकई स्वतंत्र कहलाने लायक हैं ?इसमें कोई शक नहीं कि हमें दुनिया का सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश होने का गौरव प्राप्त है हमने उद्योग,शिक्षा, विज्ञान सहित हर क्षेत्र में विशेष उन्नति की है और यह एक स्वतंत्र भारत के साकार होते सपनों की ही एक झलक है परन्तु अभी भी कुछ सपनों में रंग भरने बाकी हैं I जिस देश में बेटी को देवी की संज्ञा दी जाती है आज उसी बेटी कि सुरक्षा दिनों-दिन एक चुनौती बनती जा रही है | आज भी सैंकड़ों बहु -बेटियां प्रतिदिन दहेज़ के नाम से जलाई जा रही हैं , आज न जाने कितनी ही अजन्मी कन्याओं को दफनाया जा रहा है , कितनी ही बेटियां समाज के उन दरिंदों की दरिंदगी की भेंट चढ़ रही हैं तो क्या स्वतंत्र भारत की ऐसी घिनौनी आजादी की हमने कामना की थी जिसमें हर पल एक असुरक्षा विद्यमान रहे I देश अभी भी भ्रष्टाचार ,महंगाई ,लूट-पाट ,चोरी-डकैती आदि संकीर्णताओं से घिरा हुआ है ,तो क्या हमने ऐसे स्वतंत्र भारत की बुलंद तस्वीर की कामना की थी , क्या हमने ऐसी आजादी के सपने देखे थे, हरगिज़ नहीं I
एक सजग नागरिक की नजर में एक स्वतंत्र भारत की ऐसी छवि हो , जहाँ बस चारों तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ हों , पंक्षियों का मधुर गान हो,जहाँ नदियाँ स्वच्छ कल-कल करती हुई बहती रहे और हमारा हिमालय प्रहरी की भांति सीना ताने सदैव सुरक्षा में अडिग रहे,जहाँ सिर्फ अपनी आजादी ही नहीं वरन अपने आस-पास के लोगों की भी आजादी निहित हो ,हर व्यक्ति खुली हवा में साँस ले, कोई भी गरीब न हो ,हर व्यक्ति के पास रोजगार हो ,देश का कोई भी बच्चा कुपोषित ना हो,जहाँ सबके लिये एक से कानून हों, प्रकृति की विनाश लीला का कोई प्रसंग ना हो, चारों तरफ हरा-भरा जंगल हो | और इसके लिए हम सभी को अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए आगे आना होगा ताकि जिस स्वतंत्र भारत की तस्वीर अपने दिल, दिमाग तथा आंखों में बसाये हमारे क्रांतिवीरों ने भारत मां को आजाद कराने के लिए अपना बलिदान दिया था उन सपनों को हम साकार कर सकें ।
स्वतंत्रता दिवस पर सभी भारतवासियों को हार्दिक शुभकामनायें
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