नारी सम्मान एवं सुरक्षा पर केन्द्रित, बेहद शालीन और सात्विक तौर पर सदियों से मनाया जाने वाला रक्षाबन्धन हिन्दूधर्म का प्रमुख सांस्कृतिक, सामाजिक और पारिवारिक पर्व है जिसे प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह आपसी संबंधों की एकबद्धता, प्रेम एवं एकसूत्रता का सांस्कृतिक उपक्रम है इस दिन बहनें अपने भाई के दायें हाथ पर राखी बाँधकर उसके माथे पर तिलक करती हैं और उसकी दीर्घ आयु की कामना करती हैं। बदले में भाई उनकी रक्षा का वचन देता है। ऐसा माना जाता है कि राखी के रंगबिरंगे धागे भाई-बहन के प्यार के बन्धन को मजबूत करते हैं और सुख-दुख में साथ निभाने का विश्वास दिलाते हैं। सगे भाई बहन के अतिरिक्त अनेक भावनात्मक रिश्ते भी इस पर्व से बँधे होते हैं जो धर्म, जाति और देश की सीमाओं से परे हैं। सीमाओं पर जवानों को राखी बांधने का भी प्रचलन है I इस तरह रक्षाबन्धन आत्मीयता और स्नेह के बन्धन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का पर्व है। यही कारण है कि इस पर्व के साथ न केवल बहन भाई के लिये अपितु अन्य रिश्तों एवं सम्बन्धों में प्रगाढ़ता, आत्मीयता एवं सौहार्द का सन्देश है।
राखी का त्योहार कब शुरू हुआ इसे ठीक से कोई नहीं जानता। कहते हैं देव और दानवों में जब युद्ध शुरू हुआ तो दानव हावी होते नजर आने लगे। इन्द्र की व्यथा उनकी पत्नी इंद्राणी ने समझ ली थी। उसने रेशम का एक धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र कर इन्द्र के हाथ में बांध दिया। वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। ऐसा कहते हैं कि इस युद्ध में इसी धागे की मंत्रशक्ति से इन्द्र की विजय हुई थी। शायद इसी प्रथा के चलते पुराने जमाने में राजपूत जब युद्ध के लिए जाते थे तो महिलाएं उनके माथे पर तिलक लगाकर हाथ में रेशमी धागा इस विश्वास के साथ बांधती थीं कि यही धागा उन्हें विजयश्री के साथ वापस लेकर आयेगा। हिंदू पुराण कथाओं के अनुसार, महाभारत में, पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण की कलाई से बहते खून को रोकने के लिए अपनी साड़ी का किनारा फाड़ कर बांधा था, जिससे उन दोनों के बीच भाई और बहन का बंधन स्थापित हुआ था तथा श्रीकृष्ण ने उसकी जरूरत पड़ने पर रक्षा की। ऐसी ही एक कहानी ऋग वेद में यम और उनकी बहन यमुना की भी है। एक बार यम अपनी बहन से मिलने गए थे, यमुना ने उनका स्वागत किया, भोजन खिलाया और उनकी कलाई पर रक्षा डोर बांध कर उनकी लंबी उम्र की कामना की I इस बात से प्रसन्न होकर यम ने वचन दिया कि इस पूर्णिमा पर जो बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधेगी वह उसे लंबी उम्र का वरदान देंगे।
कहानियाँ अनगिनत हैं लेकिन इन सभी से यह स्पष्ट है कि यह रक्षा की डोर इस पावन पूर्णिमा पर पुरुषों की कलाइयों पर उनकी रक्षा की दृष्टि से बांधी जाती है। इसी के चलते अभी भी भारत में ऐसे कई घर हैं जहां बहनों के अभाव में ‘घर की राखी’ पंडित द्वारा परिवार के बड़े व्यक्ति की कलाई पर बांधी जाती है। सही मायनों में राखी जितना महत्व नारी और उसकी शक्ति को देती है, शायद ही दुनिया कि कोई और रस्म देती हो। सनातन काल से माना गया है कि पुरुष में भले ही शारीरिक बल हो, लेकिन शक्ति (नारी) की उपासना किए बिना उसका बल कोई काम का नहीं होता। जब एक बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है तो वह उस भाई की सुरक्षा की कामना भगवान से करती है और उसकी यह राखी उसके भाई की ढाल बनती है। ये सभी कथाएं बताती हैं कि पहले खतरों के बीच फंसी बहन जब भी भाई को पुकारती थी , तो भाई भी उसे सुरक्षा देने दौड़ पड़ता था और उसकी राखी का मान रखता था। आज इस परम पावन पर्व पर भाइयों को ईमानदारी से पुनः अपनी बहन ही नहीं बल्कि संपूर्ण नारी जगत की सुरक्षा और सम्मान करने की कसम लेने की अपेक्षा है। तभी राखी का यह पर्व सार्थक कहलायेगा और भाई-बहन का प्यार शाश्वत रह पाएगा l
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