आजकल पूरे भारत में मानसून अपने चरम पर है और ऐसे में स्वाभाविक है कि इस समय वर्षा होगी ही चाहे कहीं कम हो या कहीं ज्यादा। जहां ज्यादा वर्षा होगी वहां बाढ़ के साथ साथ भूस्खलन का खतरा भी मंडराएगा और इस भयावह परिस्थिति से आये दिन हिमाचल वासियों को जूझना पड़ता है क्यूंकि यहाँ की भौगोलिक स्थिति ऐसी है जहाँ मानसून के दौरान भूस्खलन बार-बार आते हैं। जिनसे न केवल जान माल का भारी नुक्सान होता है बल्कि बाढ़ की समस्या भी उत्पन्न होती हैं। अगर हम पिछले कुछ वर्षों का आंकड़ा देखें तो अनुचित वनों की कटाई, सड़क काटने, अत्याधिक भवन निर्माण जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण इसमें काफी उछाल आया है मानसून के दौरान शिवालिक और निचले व मध्य पर्वत श्रृंखला में भारी बारिश के कारण ब्यास, रावी, सतलुज तथा चंद्रभागा नदी घाटियों के ऊंचाई के क्षेत्रों की मुख्य समस्या अचानक आने वाली बाढ़ तथा नदियों की ऊंच़ी ढलानों में भारी बारिश के चलते भूमि कटाव एवं नदियों का तेज प्रवाह है। अक्सर बादल फटने के कारण आने वाली बाढ़, ग्लेशियर झील का फटना और भूस्खलन के कारण अस्थायी रूप से नदियों के प्रवाह के रूकने की घटनाएं भी आपदा का रूप ले रही हैं I एक अनुमान के अनुसार, देश में 60 प्रतिशत से अधिक नुकसान नदियों में आने वाली बाढ़ के कारण होता है। परंपरागत दृष्टि से यह कहा जाता है कि बाढ़ आने के लिए भारी वर्षा जिम्मेदार है। परन्तु अब बाढ़ में मानव का योगदान भी कोई कम नहीं है जो अत्यंत खतरनाक है जिसमें मुख्यतः धरती का तापमान बढऩा, पर्यावरणीय ह्रास, नगरीय और खेती संबंधी उपयुक्त योजना का अभाव, उपलब्ध जमीन के प्रत्येक इंच पर अमीर होने का लालच, विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में, जो वर्षा ऋतु के दौरान जल निकासी का मार्ग प्रदान करते हैं, आदि प्रमुख हैं। 40 प्रतिशत क्षति भारी वर्षा और तूफानों के कारण होती है। हिमालयी नदियां देश में होने वाले कुल नुकसान में करीब 60 प्रतिशत योगदान करती हैं। अगर हम भूस्खलन की बात करें तो इसके विभिन्न रूप हैं जैसे कि मलबे या पहाड़ी का खिसकना, मलबा गिरना या चट्टान गिरना जिन्हें पत्थर लुढ़कना, भारी वर्षा या बर्फ पिघलने से भराव, चट्टान कंपन, तटबंधों से अतिरिक्त भार, अत्याधिक वनों का कटान इत्यादि विभिन्न कारक प्रभावित करते हैं क्यूंकि भारत की सबसे ऊँची पर्वत श्रृंखला हिमालय है जो भारतीय तथा यूरेषियन प्लेट के टकराव के कारण बनी है, भारतीय विवर्तनीय परत का चीन की तरफ उत्तरी दिशा में विचलन चट्टानों पर लगातार दबाव डालता है जिससे वे अंदर से चूर-चूर,कमजोर तथा भूस्खलन तथा भूकंपों के प्रति प्रवण हो जाती हैं। भारतीय भूपटल की धीमी गति जो कि 5 सेमी. प्रति वर्ष है, के कारण दबाव पड़ता है जिसके कारण ऐसी प्राकृतिक आपदाएं होती हैं। भूस्खलन के परिणामस्वरूप होने वाली जान हानि को हम रोक सकते हैं तथा उससे निपटने के लिए अपने आपको तैयार कर सकते हैं और इसके लिए हमें आपदा प्रवंधन की ठोस जानकारी हो I ऐसी आपदा में आपके पास आपातकालीन किट होना चाहिए जिसमें बैटरी चालित टॉर्च, प्राथमिक सहायता थैला, किसी वारटपू्रफ कंटेनर में मोमबत्तियाँ तथा माचिस, आपातकालीन शुष्क खाद्य सामग्री, नकदी, आधार कार्ड,राषन कार्ड, मजबूत जूते, रस्सी और चाकू इत्यादि हो I इसके अलावा किसी भी आपात स्थिति में शांत रहे, सतर्क एवं जागरुक रहें, मौसम केंद्र से जारी होने वाली भारी बारिश की चेतावनी को ध्यान से सुनेंI यदि आपका घर मलबे से ढके इलाके से नीचे की ओर स्थित हो तो सुरक्षित स्थान पर चले जाएं I चट्टान गिरने की आवाजों, मलबा खिसकने, पेड़ों के टूटने अथवा जमीन में पड़ने वाली दरारों अथवा किसी भी हलचल की आवाज को ध्यान से सुनें I बचाव दल को बुलाएं तथा उनकी मदद करेंI यदि नदी के पास रहते हों तो विशेष रूप से बुजुर्गों, बच्चों तथा महिलाओं जिन्हें खास तौर पर सहायता की जरूरत है का ख्याल रखें, नालों से कूड़ा, पत्ते, प्लास्टिक की थैलियां, मलबा इत्यादि हटाते रहें। चट्टान गिरने वाले तथा झुकी हुई या धंसी हुई बिल्डिंग वाले, दरारों वाले हिस्सों की पहचान करें जो भूस्खलन का संकेत देते हैं तथा सुरक्षित स्थानों पर चले जाएं। अगर मटमैला या कीचड़ युक्त नदी का पानी हो तो यह भी ऊपर की ओर होने वाले भूस्खलन का संकेत देता है। सबसे महत्वपूर्ण अधिक से अधिक पेड़ों को उगाएं ताकि इसकी जड़ों के माध्यम से मिट्टी के कटाव को रोका जा सके I हिमाचल में विनाशकारी भूस्खलन की समस्या पर केंद्रित अधिक गहन वैज्ञानिक अध्ययन और इंजीनियरिंग उपायों की आवश्यकता है। भूगर्भीय और भौगोलिक तकनीकी अध्ययनों के माध्यम से भूस्खलन और चट्टान गिरने वाले क्षेत्रों की पहचान करना और लोगों को उसके प्रति जागरूक करना होगा। नई बस्तियों या इमारतों को बनाने से पहले उस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति का पता लगाने के बाद ही निर्माण की अनुमति होनी चाहिए I और जो पहले से ही बसे हैं उनके लिए भी विशेषज्ञयों की सलाह के आधार पर पुनर्स्थापित या सुरक्षा उपाय किए जाने चाहिए।
जैसे की हम जानते ही हैं कि शिक्षा व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिए बहुत आवश्यक है। इसलिए ये ज़रूरी है की शिक्षा की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए वक्त के साथ शिक्षा नीति में भी बदलाव किया जाता रहे और कहते हैं कि जीवन बदलाव का नियम है और यदि यह बदलाव सकारात्मक है, तो यह जीवन को एक नई दिशा प्रदान करता है। जिस तरह से एक जगह रुका हुआ पानी बदबू मारने लगता है उसी तरह से एक पुरानी पद्धति चाहे वो शिक्षा व्यवस्था से ही सम्बंधित हो, से भी पढाई करने पर बच्चों को शिक्षा से लाभ मिलना बंद हो जाता है इसी सकारात्मक बदलाव की और अग्रसर होते हुए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू करके शिक्षा के नवीनीकरण की ओर पहल की है जो कि निःसंदेह एक सराहनीय कदम है, जो बच्चो के मानसिक विकास को बढ़ावा देगा साथ ही अब यह विषयो को रटने की पद्धिति का त्याग कर उसे समझने के सिद्धांत पर कार्य करेगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई 2020 को घोषित किया गया। यह नीति अंतरिक्ष वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर...
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