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जनसंख्या वृद्धि से बिगड़ता स्वरूप

 आज पूरा   विश्व दिनों दिन बढ़ती जनसंख्या के कारण विकराल रूप धारण करती समस्याओं के  बोझ तले दबता चला जा  रहा है और इससे  न केवल हमारा आर्थिक संतुलन बिगड़ रहा है बल्कि सीमित प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है, जिससे प्राकृतिक एवं मानव जन्य आपदाओं तथा जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग जैसी चुनौतियां गंभीर सिर उठा रही हैं। इस जटिल समस्या से सबसे अधिक जूझने वाला अगर कोई देश है तो वो हमारा भारत है अभी भारत की आबादी 137 करोड़ है, वहीं चीन की आबादी 143 करोड़ है। संयुक्त राष्ट्र की विश्व आबादी पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 2027 तक भारत की आबादी दुनिया में सर्वाधिक होकर 150 करोड़ के पार पहुंच जाएगी। ऐसे में 2027 तक चीन को पीछे करके भारत दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। भारत में जनसंख्या और प्राकृतिक संसाधनों का अनुपात बेहद असंतुलित है। दुनिया की 2.4 फीसदी जमीन भारत के हिस्से में है, जबकि यहां संसार की तकरीबन 18 फीसदी जनसंख्या निवास करती है। संसाधन कम हैं और जनसंख्या लगातार बढ़ रही है, ऐसे में देश के सामने भुखमरी, गरीबी, बेरोजगारी से लेकर शिक्षा-स्वास्थ्य की सुविधाओं के अभाव तक का संकट है।जनसंख्या राष्ट्र की शक्ति भी कही जा सकती है ।सरकार जन बल से बड़े बड़े कार्यो को कम समय और कम खर्चे में आसानी से करवा सकती है। देश रक्षा तथा शान्ति व्यवस्था के लिये देश के पास उन्नत सेना तैयार हो सकती है। जनसंख्या अधिक होने से लाभ भी है ।लेकिन आवश्यकता से अधिक जनसंख्या वृद्धि से लाभ कम हानि अधिक ही  होती है।100 लोगों की जगह में लाख लोगों के बढ़ने से समस्या होना स्वाभाविक ही है जैसे कि  रहने के लिए घर, गरीबी, बेरोजगारी, अपर्याप्त  भोजन, पर्यावरण का बिगड़ता स्वरूप, भ्रष्टाचार आदि अनेक समस्याओं की जड़ यही है जिसके कारण नागरिकों का नैतिक पतन होता है, फलस्वरूप  राष्ट्रीय चरित्र का पतन भी स्वाभाविक है Iभारत में जनसंख्या वृद्धि के मुख्य कारणों में जन्म दर में वृद्धि तथा मृत्यु दर में कमी, निर्धनता, संयुक्त परिवार, बालविवाह, कृषि पर निर्भरता, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि, धार्मिक एवं सामाजिक अंधविश्वास, शिक्षा का अभाव प्रमुख हैं। जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए जनजागरण की आवश्यकता को देखते हुए हर वर्ष 11 जुलाई को ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ एक विशेष थीम के साथ मनाया जाता है क्यूंकि विश्व जनसंख्या आठ अरब का आंकड़ा पार करने वाली है तो इस 2022 का विषय है 8 अरब की दुनिया : सभी के लिए लचीले भविष्य की ओर - अवसरों का दोहन और सभी के लिए अधिकार और विकल्प सुनिश्चत करना l इसी दिन अर्थात् 11 जुलाई 1987 को जब दुनिया की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, तो  संयुक्त राष्ट्र संघ ने परिवार नियोजन का संकल्प लेने के दिन के रूप में स्मरण करने का दिवस घोषित किया। तभी से इस दिन का पूरी दुनिया में विशेष महत्व है, क्योंकि आज दुनिया के हर विकासशील और विकसित देश, जनसंख्या विस्फोट से चिंतित हैं। विकासशील देश अपनी आबादी और जनसंख्या के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रहे हैं तो विकसित देश पलायन और रोजगार की चाह में बाहरी देशों से आकर रहने वाले शरणार्थियों के कारण इस समस्या से जूझ रहे  हैं। भारत सरकार भी  इस समस्या के समाधान हेतु प्रयत्नशील रही है। परिवार नियोजन का जनसंचार द्वारा व्यापक प्रचार प्रसार किया जा रहा  है। बेतहाशा बढ़ते जनसैलाब को रोकने के लिए जिम्मेदार अभिभावक अधिनियम, जनसंख्या नियंत्रण कानून और टू चाइल्ड पॉलिसी जैसी योजनाओं को लागू करने की तैयारी की जा रही है देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों प्रकार के प्रयत्न करने  चाहिए। सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही स्तरों से इस समस्या के निवारण का प्रयास होना चाहिए। इस कार्य में तत्परता ,ईमानदारी पूरे बल से जुटने की आवश्यकता है , अन्यथा इसकी वृद्धि से परिणाम भीषण और घातक हो सकता है। देश का  हर नागरिक जब तक इस समस्या में सहयोग नहीं करेगा  तब तक इस समस्या का समाधान कठिन है ।यदि सब मिलकर ध्यान देंगे तो पर्यावरण की समस्या,बेरोजगारी की समस्या , स्थान की समस्याओं का समाधान हो सकता है ।जनसंख्या की वृद्धि को कम करने के सम्बन्ध में ‘बी के सूरज भाई’ का यह विचार भी अत्यंत सराहनीय लगता है कि जिस मानव को एक बच्चा हो उस बच्चे को सबसे पहले नौकरी देनी चाहिए,उसके बाद दूसरे को ,उसके बाद तीन बच्चे वाले को , उसके बाद अन्य को। अगर इस सुझाव को सरकार मान्यता दे दे तो इस समस्या का समाधान शायद कुछ हद तक हो ही जायेगा। बढ़ती जनसंख्या प्रकृति के विनाश का कारण बन चुकी है अत: इसके  प्रति सभी को जागरूक होना जरूरी है, क्योंकि यह केवल परिवार का मुद्दा नहीं है, बल्कि प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों में द्रुत गति से हो रही कमी का भी मुद्दा है। जब तक बढ़ती आबादी नहीं रुकेगी, तब तक प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी भी नहीं रुकेगी।

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