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जैव विविधता का सरंक्षण सबसे अहम्


दुनिया भर में खत्म होती  जैव विविधता सभी के लिए चिंता का विषय बनी हुई  हैं। सभी देश जैव विविधता को बचाने के तमाम प्रयास कर रहे हैं। लोगों में जैव विविधता के संरक्षण के लिए जागरुकता फैलाने के लिए 22 मई का दिन ‘‘विश्व जैव विविधता दिवस’’ के रूप में मनाया जाता है I राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नीतियां और कानून बनाए जा रहे हैं। जैव विविधता अधिनियम, 2002 भारत में जैवविविधता के संरक्षण के लिए संसद द्वारा पारित एक संघीय कानून है। जो परंपरागत जैविक संसाधनों और ज्ञान के उपयोग से होने वाले लाभों के समान वितरण के लिए एक तंत्र प्रदान करता है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की स्थापना 2003 में 'जैव विविधता अधिनियम, 2002' को लागू करने के लिए की गई थी। यह  एक सांविधिक, स्वायत संस्था है जो  जैविक संसाधनों के साथ-साथ उनके सतत उपयोग से होने वाले लाभ की निष्पक्षता और समान बटवारे जैसे मुद्दों पर भारत सरकार के लिए सलाहकार और विनियामक की भूमिका निभाती है। जैव विविधता अलग-अलग तरह की वनस्पतियों एवं जानवरों का संग्रह है जो एक ही विशेष क्षेत्र में रहते या फैले हुए है। जैव विविधता जितनी समृद्ध होगी उतना ही सुव्यवस्थित और संतुलित हमारा वातावरण होगा। अलग-अलग तरह की वनस्पति तथा जीव-जंतु भी धरती को रहने के योग्य बनाने के लिए अपना योगदान देते है। इंसान के जीवन के पीछे भी जैव विविधता का ही हाथ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अलग-अलग जंतु और पेड़-पौधे ही मिलकर मनुष्य की मूलभूत जरूरतें पूरी करने में सहायता करते है। एक अनुमान के मुताबिक पृथ्वी पर लगभग 3,00,000 वनस्पति तथा इतने ही जानवर है जिसमें पक्षी, मछलियां, स्तनधारी, कीड़े, सींप आदि शामिल है। ये सभी प्रजातियां एक दूसरे की मूलभूत जरूरतों को पूरा करती है जिससे एक समृद्धशाली जैव विविधिता का निर्माण होता है। पिछले कई सालों से जैव विविधता को समृद्ध बनाये रखने पर बहुत जोर दिया जा रहा है परंतु फिर भी कुछ समय से इसकी गरिमा में गिरावट देखी गयी है जिसकी आने वाले समय में और भी ज्यादा गिरने की आंशका जताई जा रही है। इसके पीछे मुख्य कारण है औद्योगिक फैक्टरियों से लगातार निकलता प्रदूषण और  पेड़ों के कटने से पर्यावरण पर पड़ने वाला  विपरीत प्रभाव, जिसके  कारण कई वनस्पतियों की और जानवरों की प्रजातियां विलुप्त हो गयी है और कई होने की कग़ार पर है। इस बदलाव का एक संकेत तो साफ़ है की आने वाले समय में पृथ्वी पर बहुत ही भयंकर संकट खड़ा हो जायेगा। इससे जैव विविधता का संतुलन तो निश्चित रूप से बिगड़ेगा ही तथा मनुष्य के साथ साथ जीव जंतुओं के जीवन पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जायेगा। विकास की बयार में औद्योगिकरण तेजी से बढ़ रहा है। उद्योगों का बढ़ता यही दायरा प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है। दरअसल, वृक्षों के कटान से सीधे पर्यावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इससे ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या बढ़ती जा रही है, जिसका सीधा असर मौसम पर दिखाई दे रहा है। बेमौसम बरसात और सर्दी के दिनों में गर्म होते मौसम से साफ है कि यदि हम  पर्यावरण के प्रति सचेत नहीं हुए तो परिणाम और भी भयावह होंगे। यही नहीं कम होते पेड़ों का असर जैव विविधता पर भी साफ दिखाई दे रहा है। हर 10 साल में स्तनधारी जीव जंतुओं की एक श्रेणी विलुप्त हो जाती है। जमीन कमजोर हो रही है। कहीं जलस्तर गिरने की समस्या है तो कहीं बंजर होती जमीन । रासायनिक प्रयोगों ने किसानों की फसलों को जहरीला बना दिया है। यही नहीं उद्योगों से निकलने वाले दूषित पानी से भी जमीन का उर्व्रीकरण कम होता जा रहा है I  पॉलीथीन, प्लास्टिक जैसी वस्तुओं से भी जैव विविधता बिगड़ रही है। ऐसे में यदि पर्यावरण को बचाने के लिए जमीनी स्तर पर कार्य नहीं हुए तो जीवन भी खतरे में पड़ जाएगा। लिहाजा, समाज के हर व्यक्ति को वृक्षों को काटने से बचना होगा। साथ ही पौधारोपण के प्रति ध्यान देना होगा, ताकि पर्यावरण को संतुलित स्तर पर लाया जा सके। अब वक़्त आ गया है कि हम एक ऐसे पर्यावरण  का निर्माण करें  जो जैव विविधता में समृद्ध, टिकाऊ और आर्थिक गतिविधियों के लिए अवसर प्रदान कर सके। जैव विविधता के कमी होने से प्राकृतिक आपदा, जैसे- बाढ़, सूखा और तूफ़ान आदि आने का खतरा और अधिक बढ़ जाता है। अत: हमारे लिए जैव विविधता का संरक्षण बहुत ज़रूरी है। लाखों विशिष्ट जैविक और कई प्रजातियों के रूप में  पृथ्वी पर जीवन उपस्थित है और हमारा जीवन प्रकृति का अनुपम उपहार है। अत: पेड़-पौधे, अनेक प्रकार के जीव-जंतु, मिट्टी, हवा, पानी, महासागर, पठार, समुद्र, नदियां इन सभी प्रकृति की देन का हमें संरक्षण करना चाहिए, क्योंकि यही हमारे अस्तित्व एवं विकास के लिए काम आती है। मनुष्य के तकनीक के प्रति बढ़ते प्रेम को कम करने की जरुरत है। वह तकनीक और नए नए अविष्कार करने में इतना मग्न हो गया है की उसे अपने आसपास के वातावरण के बढ़ते प्रदूषण से कोई लेना देना ही नहीं है। मनुष्य को इस तरफ सोचना होगा कि दूषित होते वातावरण से सिर्फ उसका ही नुकसान हो रहा है अब यह हर नागरिक  की भी जिम्मेदारी है कि वह इस नेक कार्य में हिस्सा ले और वातावरण को शुद्ध बनाने में सरकार का सहयोग करे ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए हम हम एक स्वच्छ पर्यावरण और समृद्ध जैव विविधता छोड़ कर जाएँ l 

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