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बदलाव की असीम संभावनाओं से भरे हैं सरकारी स्कूल

 यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (यूडीआईएसई+) की 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में कुल 15,07,708 स्कूल हैं, जिनमें से 10,32,570 स्कूल केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा संचालित किये जा रहे हैं, 84,362 सरकारी सहायता प्राप्त हैं, 3,37,499 गैर-सहायता प्राप्त निजी स्कूल हैं, जबकि 53,277 स्कूलों का संचालन अन्य संगठनों एवं संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है। भारत की आबादी का 75% हिस्सा मध्यवर्गी परिवारों  से है जो आज के निजि स्कूलों का शुल्क देने में असमर्थ है। सरकारी स्कूलों का शुल्क कोई भी गरीब परिवार बहुत ही आसानी से उठा सकता है। बच्चों को स्कूल में मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा क़ानून, 2009 के अनुसार सारी सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। सरकारी स्कूलों में किताबें और यूनिफॉर्म भी मुफ़्त दिए जाते हैं जिससे अभिभावकों को आर्थिक रूप से काफ़ी सहूलियत मिलती है। सरकारी स्कूलों में मिड डे मील की व्यवस्था से बच्चों के स्वास्थ्य का भी विशेष ख्याल रखा जाता है। सरकारी स्कूलों के प्रति हमारा नज़रिया कैसा है? इनके  बारे में अच्छा क्या है? हम वहाँ पढ़ने वाले बच्चों के बारे में क्या सोचते हैं? सरकारी स्कूल में पढ़ने के लिए बच्चे जिस परिवेश से आते हैं, उसको लेकर हमारी क्या धारणा है? गाँव और शहर के बाहरी इलाक़ों के बारे में हमारी क्या राय है? आम तौर पर इन प्रश्नों के जवाब हर अभिभावक के लिए सरल हैं  क्यूंकि हम अपने देश में सरकारी स्कूलों के बारे में इतनी नकारात्मक कहानियां सुन चुके हैं। अपने मन में सरकारी स्कूलों, वहां के शिक्षकों और बच्चों के बारे में ऐसी छवि निर्मित कर चुके हैं, जिसे बदलने के लिए एक ऐसे  अनुभव की जरूरत है जो आपकी बहुत सारी मान्यताओं पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दे। मगर ऐसा अनुभव मिलना, बहुत सामान्य सी बात भी नहीं है। क्योंकि आमतौर पर बहुत से स्कूलों में पुराने ढर्रे पर चीज़ों का संचालन होता है। इसे लांघकर कुछ नया करने और चीज़ों को बदलने की कोशिश करने वाले शिक्षकों को भी व्यवस्था के साथ समायोजन में काफी दिक्कत होती है। एक तरफ व्यवस्था चाहती है कि शिक्षक लकीर के फकीर हो जाएं। वहीं नए या स्व-प्रेरणा से काम करने वाले शिक्षकों के भीतर चीज़ों को बदलने की परवाह होती है। ऐसे शिक्षक अपने काम से बार-बार साबित करते हैं कि वे सही मायने में शिक्षक हैं, ‘लकीर के फकीर’ नहीं। ऐसे शिक्षकों के काम करने जज्बा और प्रेरणा उनको बाकी शिक्षकों से अलग करती है। ऐसे शिक्षक का बच्चों के साथ काफी सहज रिश्ता होता है। वे उनके साथ संवाद करते हैं।  वे  इस बात में भरोसा करते  है कि उन्हें ऐसा काम करना चाहिए जिससे बच्चों को खुशी मिले। स्कूल में उनका आना सार्थक हो। वे स्कूल से रोज़ाना कुछ न कुछ सीख करके जाएं। अपने जीवन में तमाम बाधाओं को पार करके आगे बढ़ें। सरकारी स्कूल बदलाव की असीम संभावनाओं का दूसरा नाम है। वहां काम करने और बच्चों व अभिभावकों का अपनापन पाने का जितना अवसर है, उतना दूसरे किसी क्षेत्र में नहीं है। सरकारी स्कूल एक ऐसी जगह है, जहाँ गाँव, छोटे कस्बों और शहरों के उन बच्चों के सपने पल रहे हैं जिनको वाकई मदद और सहयोग की जरूरत है। सतत प्रोत्साहन और प्रेरणा की जरूरत है ताकि समय से पहले ही सपनों के फूल मुरझाने की बजाय फिर से जीवंत हो उठें। सरकारी स्कूल जो दूर-दराज के क्षेत्रों में स्थित है, वहाँ के लोग सोचते हैं कि यहाँ कौन आता है? कौन ध्यान देता है? यहाँ की किसको पड़ी है? हम क्या कर रहे हैं, इससे किसी को कोई फर्क़ नहीं पड़ता। मगर सच तो यह है कि फर्क़ पड़ता है। इस देश पर फर्क़ पड़ता है जहाँ बच्चे शिक्षा के अपने बुनियादी अधिकार से वंचित हो रहे हैं। इस तरह  की नकारात्मकता  से मुक्ति दिलाने में शिक्षा की अहम भूमिका है। ये वो सरकारी स्कूल हैं जो समाज के सबसे जरूरतमंद लोगों को शिक्षित करने का काम कर रहे हैं। यही बात सरकारी स्कूलों के बारे में सबसे अच्छी बात है, जो इस तरफ ध्यान देने के महत्व को रेखांकित करती है। हमें सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले ऐसे शिक्षकों का शुक्रगुजार होना चाहिए जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने काम को पूरी लगन और मेहनत के साथ अंजाम दे रहे हैं। नकारात्मक विचारों को भाव न देकर, काम के सकारात्मक असर और खुशी को लोगों के साथ साझा कर रहे हैं। ऐसे ही माहौल में एक नये और व्यापक बदलाव की उम्मीद छुपी है, जहाँ किसी बच्चे को उसकी पारिवारिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के कारण हीन भावना से नहीं देखा जाता। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे भी उतने सम्मान और स्नेह के हक़दार हैं, जितने किसी नामी-गिरामी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे। उनके सवाल उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितने किसी अन्य बच्चे को। उनको भी दुलार पाने का उतना ही अधिकार है जितना किसी अन्य बच्चे को, क्योंकि वे भी भारत के नन्हे नागरिक हैं, जो भविष्य में अपनी जिम्मेदारी के माध्यम से देश को आगे ले जाने में अपनी भूमिका चुनेंगे और उसका निर्वाह करेंगे। थोड़े बहुत बदलावों के बाद सरकारी स्कूल राष्ट्र के विकास में एक अहम भूमिका निभा सकते हैं। एक अनुशासित ढंग से सरकारी स्कूल के संचालन से बच्चों को एक अच्छा माहौल मिलेगा। कम पैसे में अगर अच्छी पढ़ाई मिलेगी तो गरीब घर के बच्चे जिन्हें पढ़ाई में रुचि है और आगे कुछ बड़ा करना चाहते हैं, वो सरकारी सुविधाओं का फायदा उठाकर अपनी मंजिल प्राप्त कर सकते हैं तथा राष्ट्र के विकास में अपनी भूमिका अदा कर सकते हैं


रजनीश रांगड़ा

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