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बच्चों में आत्मविश्वास की कमी :; एक बड़ी चुनौती

 कहते हैं कि जीवन में सबसे अच्छा साथी हमारा आत्मविश्वास है l आत्मविश्वास वस्तुतः एक मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्ति है। आत्मविश्वास से ही विचारों की स्वाधीनता प्राप्त होती है और इसके कारण ही महान कार्यों के सम्पादन में सरलता और सफलता मिलती है । जो व्यक्ति आत्मविश्वास से ओत-प्रोत है, उसे अपने भविष्य के प्रति किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रहती । आत्मविश्वास की वजह से आप अपने लक्ष्य को आसानी से पूरा कर सकते है आत्मविश्वास से प्रेरित होकर आप अपने जीवन मे जो कुछ भी करना चाहते हैं वह सबकुछ बहुत आसानी से कर सकते हैं। आत्मविश्वास का अर्थ है, अपने काम में अटूट श्रद्धा। इस कोरोना महामारी के आने के बाद लगभग दो साल से ज्यादातर  ऑनलाइन पढ़ाई करने के बाद छात्रों का आत्मविश्वास डगमगा गया है। उनकी याद करने की क्षमता तो कम हुई है, लिखने की रफ्तार भी काफी घट गई है। छात्र थोड़े चिड़चिड़े भी हो गए हैं। स्कूल खुलने के बाद ऑफलाइन क्लास में शिक्षकों को बच्चों में ये बदलाव देखने को मिले। अब शिक्षक लर्निंग और राइटिंग के आधार पर होमवर्क दे रहे हैं ताकि वे फिर से पुरानी लय में लौट सकें Iऑनलाइन पढ़ाई का माहौल क्लास के माहौल से बिल्कुल उलट रहा। जहां पूरी क्लास एक शिक्षक की निगरानी में पढ़ती थी, वहीं ऑनलाइन पढ़ाई के दौरान बच्चे आराम से पढ़ते थे। बच्चों में अनुशासन भी देखने को नहीं मिला। एक तरफ जहां वे करीब पांच घंटे टिक कर क्लास में पढ़ते थे वहीं, ऑनलाइन क्लास में एक दिन में ज्यादा से ज्यादा तीन से चार क्लास कर पाते थे। अब फिर से  कक्षाओं की ऑफलाइन पढ़ाई शुरू हुई है तो  शिक्षकों का मानना है कि बच्चों की न केवल व्यावहारिक बल्कि शैक्षिक क्षमता भी प्रभावित हुई है। अब अगली कक्षा में जाने से पहले छात्रों की क्षमता का विकास करने की पूरी कोशिश की जा रही है। बच्चों के अन्दर आत्मविश्वास कैसे पैदा करें ये भी बड़ी चुनौती है क्यूंकि जब तक पाठशालाओं में सभी गतिविधियाँ सुचारू  रूप से नहीं चलती तब तक यह   काम मुश्किल सा लगता है पर असंभव भी नहीं है आत्मविश्वास जीवन में सुरक्षा और कामयाबी के लिए बहुत जरूरी है, इसके लिए ना ही कोई दवा आती है और ना ही ये रातों रात आता  है। बच्चों के अन्दर आत्मविश्वास जगाने के लिए न केवल अध्यापकों को कोशिश  करनी होगी अपितु उनके  अभिभावकों की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होगी I अभिभावक ध्यान दें, जब भी बच्चे मेहनत करें, आप उनकी तरीफ करें, चाहे जीत हो या ना हो उनके छोटे छोटे प्रयासों को नजर अन्दाज ना करें। हर कदम पर उनका साथ न दे , बुरी आदतों को छोड़ने  के लिए उनको भी निर्णय लेने का मौका दें, बहुत जल्दी हल मत दें। प्रयास करने की आदत उनमें डालें, उससे ही उनके अंदर काम करने की क्षमता आएगी। लेकिन  बहुत ज्यादा उनपर दबाव ना डालें। उनकी क्षमताओं पर यकीन करें। बचपन से ही उनसे बड़ों वाली उम्मीदें ना करें, बहुत ज्यादा उम्मीदों से वो प्रोत्साहित तो नहीं होते अपितु उनके अंदर हारने का एहसास होता पैदा हो सकता है। उनके अन्दर जो नई चीजें जानने की इच्छा है उसके लिए उन्हें प्रोत्साहित करें तो वो आपसे बहुत सवाल करेंगे पर ये अच्छा है क्यूंकि इसका मतलब है कि वो अपने दिमाग का इस्तेमाल करने की राह पर हैं और उनको ये बात समझ में आ गई है कि कौन सी चीजें जानने   लायक हैं। कभी भी उनके काम की बुराई ना करें, अगर उनमें कोई कमी है तो उस कमी को कैसे सुधारना है उस पर ध्यान दें। मां-बाप की बुराई के कारण बच्चे अपनी इज्जत करना छोड़ देते हैं और उनके अन्दर से आगे बढ़ने की प्रेरणा कम हो जाती है। उनकी गलतियों को सीढ़ी समझ कर उनको आगे बढ़ने की प्ररेणा दें l 

वर्तमान में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखते हुए आज के अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई को लेकर काफी सतर्क रहते हैं। यही कारण है कि वे उनको पढ़ाई के लिए डांटना या अन्य कार्यों के लिए रोक-टोक लगाना शुरू कर देते हैं। अगर आप भी अपने बच्चे पर पढ़ाई के लिए ऐसे ही दबाव डालते हैं तो जान लें, अब इस थ्योरी में थोड़े बदलाव की जरूरत है। अगर आप अपने बच्चे को पढ़ाई के प्रति प्रेरित करना चाहते हैं तो इसके लिए आपको अनुशासन और प्यार, दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा। 

अक्सर माता- पिता अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों के साथ करते हैं। ऐसे में यह बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। अगर बच्चे लगातार ऐसी बातें सुनते हैं तो उनके अंदर हीन भावना पैदा होने लगती है। अनजाने में ही सही लेकिन अभिभावक  ऐसी बातें करके बच्चों को बेहद नुकसान पहुंचा रहे हैं। ऐसे में समझना होगा कि हर बच्चे की अपनी खासियत होती है। आपका फर्ज है उन खूबियों को पहचानना और उन्हें निखारने की कोशिश करना। हर माता-पिता की इच्छा होती है कि उनका बच्चा डॉक्टर, इंजीनियर या बड़ा अधिकारी बने लेकिन कम नंबरों को देखकर हम अपने बच्चों का मूल्यांकन करना शुरू कर देते हैं और उनकी योग्यता पर शक करते हैं। ऐसे में अधिक दबाव के कारण बच्चे का आत्मविश्वास कमजोर हो जाता है। और वह भविष्य में एंग्जाइटी और डिप्रेशन जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं का शिकार भी हो सकता है। बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित जरूर करें लेकिन उन्हें उनकी योग्यता पर शक उनके नंबरों के आधार पर ना करें। कभी-कभी बच्चे को पढ़ाई को लेकर माता-पिता तनाव में रहने लगते हैं। ऐसे में माता पिता  को सबसे पहले यह सोचना चाहिए कि उनका बच्चा क्यों नहीं पढ़  रहा है? इसके पीछे कारण क्या है? जब माता-पिता इस वजह को ढूंढ लेंगे तो वे भी अपने बच्चे को और अच्छे ढंग से समझ पाएंगे। अभिभावक  अपने बच्चों की दिनचर्या को व्यवस्थित करें। उसमें उनके पढ़नें के समय  को भी अनिवार्य रूप से शामिल करें, और उस वक्त पूरी तरह उनके साथ बैठे रहें। जब भी वे स्कूल से लौट कर आए तो उसके बैग और होमवर्क के साथ-साथ यह भी जाने की क्लास में से क्या पढ़ाया गया? और बच्चे को समझ में क्या दिक्कत आई? अपने बच्चे को बेहतर ढंग से समझने के लिए उसकी बातों को अनसुना न करें। उसे डांटकर चुप कराने की बजाए उसकी बातों को ध्यान से सुनें। इन सब बातों का अगर हम सही तरीके से इस्तेमाल  करें तो बच्चों के अन्दर खोया हुआ आत्मविश्वास दोबारा जगा सकते हैं और जिससे वे अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हो सकते हैं I

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