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कोरोना ने बदला शिक्षा देने का तरीका

 देश में कोरोना की शुरुआत  30 जनवरी 2020 में केरल में मिले एक मरीज से हुई और धीरे-धीरे पिछले  दो वर्षों में कोरोना ने देश में तबाही के कई मंज़र दिखा दिए। इसका व्यापक असर, न केवल उद्योगों और व्यापार पर पड़ा, बल्कि इसका एक बड़ा असर स्कूलों पर, बच्चों की मानसिक स्थिति और उनकी मनोदशा पर भी पड़ा है। लगभग दो वर्ष से महामारी के कारण पूरे भारत के अधिकांश स्कूल लगभग बंद चल रहे हैं। बच्चे घरों में ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं। स्कूली छात्रों की सामान्य दिनचर्या, जिसमें केवल क्लासरूम में प्रत्यक्ष पढ़ाई ही नहीं शामिल होती है, बल्कि अन्य ऐसी  गतिविधियां जिनसे उनका सर्वागीण विकास होता है भी  बाधित हो गयी हैं। कोविड महामारी का सबसे गहन प्रभाव देश की शिक्षा व्यवस्था के संचालन को लेकर दिख रहा है, जो मानव संसाधन के निर्माण के साथ ही युवा भारत की सामथ्र्य से भी जुड़ा हुआ है। महामारी के चलते स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से तात्कालिक कदम के रूप में शैक्षिक संस्थानों को प्रत्यक्ष भौतिक संचालन से मना कर दिया गया, फिर कक्षा की पढ़ाई और परीक्षाएं जहां भी संभव थीं, आभासी (वर्चुअल) माध्यम से शुरू की गईं। इसमें संदेह नहीं कि बौद्धिक, सामाजिक और भावनात्मक विकास के लिए शिक्षा केंद्र में विद्यार्थी की भौतिक उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है, पर महामारी के कारण विद्यालय की अवधारणा ही बदल गई। तमाम विद्यार्थी आनलाइन प्रवेश, आनलाइन शिक्षा और आनलाइन परीक्षा को बाध्य हुए। शिक्षा केंद्र विद्यार्थी और शिक्षक से भौतिक रूप से दूर तो हुए ही, उनके विकल्प में मोबाइल या लैपटाप की स्क्रीन पर लगातार घंटों बैठने से परेशानियां भी होने लगीं। सच तो यह है कि शिक्षा पाने का प्रेरणादायी अनुभव उबाऊ होने लगा। अचानक हुए इस परिवर्तन ने सभी राज्यों, वर्गों, जाति, लिंग और सभी क्षेत्रों के बच्चों की एक बड़ी संख्या को प्रभावित किया है। महामारी के दौरान, भारत में, स्कूलों के अचानक बंद हो जाने के कारण, पारंपरिक कक्षा आधारित भारतीय स्कूली शिक्षा प्रणाली अब एक अनियोजित ऑनलाइन आधारित शिक्षा प्रणाली के रूप में स्थानांतरित हो गई है। अनियोजित इसलिए कि, न तो हम मानसिक रूप से और न ही तकनीकी रूप से ऑनलाइन शिक्षा की इस अचानक आ पड़ी चुनौती से निपटने के लिये, तैयार थे।अचानक होने वाला यह अप्रत्याशित तकनीकी बदलाव न केवल छात्रों को, डिजिटल रूप से विभाजित कर रहा है, बल्कि उनके सीखने की क्षमता और उनकी समग्र प्रगति को भी धीमा कर दे रहा है। यह एक तथ्य है कि सामूहिकता न केवल तरह-तरह से सीखने की क्षमता को बढ़ाती है, बल्कि वह तरह-तरह की होने वाली चुनौतियों से निपटने के लिये बच्चों को मानसिक रूप से तैयार भी करती है। बच्चों पर, उनकी सीखने की क्षमता और विविधता के अलावा, स्कूली शिक्षा की अनुपस्थिति का, बच्चों और किशोरों के समग्र विकास पर दीर्घकालिक प्रभाव भी पड़ेगा। हाल ही में किए गए यूनिसेफ के एक अध्ययन के अनुसार, “छात्र स्कूल बंद होने पर स्व-अध्ययन पर समय तो अधिक व्यतीत कर रहे हैं पर सीख कम रहे हैं, जबकि, स्कूल में कम समय बिताते हैं और, अधिक सीखते हैं।” यानी स्कूलों में वे कम समय के बावजूद, अधिक मात्रा में और अधिक तेजी से पाठ्यक्रम सीखते हैं। जबकि घरों में ऑनलाइन पर अधिक समय देने के बावजूद, अधिक नहीं सीख पा रहे हैं। यह अंतर सामूहिक और एकल अध्ययन के गुणदोष का है। सामूहिकता सीखने की क्षमता, लालसा और उत्कंठा को बढ़ा देती है, जबकि एकल अध्ययन, नीरस और उबाऊ हो जाता है। अब अगर हम ऑनलाइन शिक्षा के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी की और नेट की पहुंच क्षमता का आकलन करें तो पाएंगे कि हम में से अधिकांश अपने देश में भौगोलिक और सामाजिक-आर्थिक वर्गों में ‘डिजिटल हैव नॉट्स’ की तरह ही हैं,यानी वे इलाके जो नेटवर्क और अन्य सायबर सुविधाओं में पिछड़े हैं। इस अध्ययन के अनुसार, ज्यादातर  राज्यों में, 10 प्रतिशत छात्र स्मार्ट फोन, फीचर फोन, टीवी, रेडियो, या लैपटॉप / कंप्यूटर आदि किसी भी उपकरण से वंचित हैं। यह मुख्यतः ग्रामीण क्षेत्रों की व्यथा है, जहां स्कूल और शिक्षक तो हैं पर ऑनलाइन पढ़ाई के लिये आवश्यक उपकरण नहीं हैं। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि, जनता तक प्रौद्योगिकी की पहुंच अभी दूर की बात है। यूनिसेफ के इस अध्ययन के निष्कर्ष के अनुसार, “माता-पिता और शिक्षक दोनों महसूस करते हैं कि छात्र स्कूलों की तुलना में ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से कम सीखते हैं। 5 से 13 वर्ष की आयु के छात्रों के 76 प्रतिशत और 14 से 18 वर्ष की आयु के 80 प्रतिशत, किशोरों के बारे में इस अध्ययन की रिपोर्ट है कि छात्र स्कूलों में जितना सीखते हैं, उसकी तुलना में ऑनलाइन शिक्षा में वे कम सीख रहे हैं।अध्ययन के अनुसार, 67 प्रतिशत शिक्षक यह मानते हैं कि यदि स्कूल खुले रहते तो जितना छात्र स्कूलों में जाकर पढ़ते सीखते हैं, उसकी तुलना में छात्र अपनी समग्र सीखने की क्षमता में पिछड़ रहे हैं। सीखने की क्षमता में कमी के अतिरिक्त, स्कूल बंद होने के कारण, छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा है। जैसे-जैसे छात्र अपने घरों में, महामारी से उपजे  एकांत  में कैद होते गए, वे अपने मित्रों और शिक्षकों से दूर होते गए। साथ ही महामारी में आने वाली बुरी खबरों का असर जो घर के बड़ों पर पड़ा, उनके तनाव से भी बच्चों और किशोरों के मन मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। माता-पिता की नौकरियों पर असर पड़ा, कुछ महामारी के ग्रास बन गए तो, इसका असर पड़ा और घर में लगातार महामारी के कारन उत्पन्न  नकारात्मकता ने बच्चों को मानसिक रूप से रुग्ण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। घर के एकांत और हमउम्र मित्रों के अभाव के कारण उपजी संवादहीनता ने बच्चों के सीखने की क्षमता और स्वाभाविक जिज्ञासु भाव को बहुत अधिक प्रभावित किया है। कोरोना विषाणु का पता 2019 में लगा था और तब से इसके अनेक वेरिएंट अल्फा, बीटा, गामा, डेल्टा, लेम्डा, ओमिक्रोन ,डेल्मीक्रोन और नियोकोव सामने आ चुके हैं तथा इनमें सैंकड़ों बदलाव आ गए है, मगर अब लोगों को इनके साथ ही जीना होगा। दो साल पहले शुरू हुआ कोरोना संक्रमण का खतरा अभी भी नहीं टला है और ऐसा भी नहीं दिख रहा है कि यह वायरस जल्दी ही मानवता का पीछा छोड़ देगा। सरकार को शिक्षा, विशेषकर स्कूली शिक्षा से जुड़ी समस्याओं को गम्भीरता से लेना होगा। देखना है कि नई शिक्षा नीति का मसौदा कार्य रूप में किस तरह व्यावहारिक धरातल पर उतरता है। सबसे जरूरी है कि शिक्षा की आधार संरचना में निवेश किया जाए। कोरोना जाएगा पर शिक्षा का स्वरूप पहले जैसा नहीं रह जाएगा और उस स्थिति के लिए तैयारी जरूरी है। महामारी एक अस्थायी समस्या है। टीकाकरण और अन्य इलाज की संभावनाएं तलाश की जा रही हैं। स्थिति सामान्य होगी ही और स्कूल भी खुलेंगे। पर शिक्षा, कम से कम स्कूली शिक्षा तो सर्वसुलभ हो, यह देश और समाज की बेहतरी के लिये अनिवार्य है।

रजनीश रांगड़ा

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