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भारत के महानायक सुभाष चंद्र बोस

भारत की आजादी की लड़ाई मैं यूं तो लाखों करोड़ों हिंदुस्तानियों ने भाग लिया लेकिन कुछ ऐसे सपूत भी थे जो इस आजादी की लड़ाई के प्रतीक बनकर उभरे l राष्ट्र धर्म की खातिर क्रांति की पहली गोली चलाने वालों को भले ही तोपों से उड़ा दिया गया, लेकिन जो चिंगारी उन्होंने लगाई उस आग में तप कर निकले स्वाधीनता सेनानियों ने अपने अहिंसक आंदोलन से अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया l आजादी की इस महागाथा में उन युवा महानायकों को भी याद रखा जाएगा जिन्होंने बहरे कानों को सुनाने के लिए धमाके किए तो किसी ने देश के लिए आजाद शहीद होना चुना l खून के बदले आजादी के नारों के साथ सेना का गठन कर शक्तिशाली बर्तानवी साम्राज्य को चुनौती देने का साहस करने वाले वीरों  और भारत को खंडित होने से बचाने वाले फौलादी इरादों से ही इस स्वतंत्र भारत की नीव पड़ी है l "निजी जीवन से देश बड़ा होता है हम मिटते हैं, तब देश खड़ा होता है" ऐसे ही कुछ थे मिट्टी के लाल, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी सेनानी , आजाद हिंद फौज के सुप्रीम कमांडर नेताजी सुभाष चंद्र बोस  जिन्होंने इन पंक्तियों को सार्थक किया। "दिल्ली चलो, जय हिन्द, तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा..." ये कुछ ऐसे नारे थे, जो नेता जी की सबसे बड़ी पहचान बनकर उभरे। वैसे तो सुभाष चंद्र बोस का स्मरण पूरे वर्ष होना चाहिए, लेकिन आज उनके जन्मदिन पर उन्हें याद न करना देशभक्ति के साथ-साथ देश को भी भूल जाने जैसा होगा। नेताजी ने जो हमारे देश को दिया, वो हमेशा हर सच्चे भारतवासी के ज़ेहन में जीवित रहेगा l सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम जानकीनाथ बोस और मां का नाम प्रभावती था। बचपन की एक घटना का सुभाष चंद्र बोस के ऊपर गहरा असर पड़ा था। जिन दिनों वे स्कूल में थे, उन दिनों किसी ने एक हिन्दुस्तानी बच्चे को ब्लैक मंकी कह दिया था। सुभाष इस तरह की बातों से दु:खी होते थे और उनका विरोध भी करते थे। उनके समय की परिस्थितियों ने उन्हें उद्वेलित किया और उनके भीतर देशभक्ति की भावना का संचार किया। जानकारों की मानें, तो भारत में चाणक्य के बाद नेतीजी सुभाष चंद्र बोस ही अब तक के सबसे बड़े कूटनीतिज्ञ और राजनीतिज्ञ रहे।माता-पिता ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए बोस को इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया था। अंग्रेजी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था, लेकिन उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। उनके पिता ने अंग्रेजों के दमन चक्र के विरोध में रायबहादुर की उपाधि लौटा दी इससे सुभाष के मन में अंग्रेजों के प्रति नफरत का भाव घर कर गया  और उन्होंने  अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने व भारत को स्वतंत्र कराने का संकल्प लिया l उनके पिता ने भी  उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा “जब तुमने देश सेवा का व्रत ले ही लिया है तो कभी इस पथ से विचलित मत होना” l दर्शनशास्त्र नेताजी सुभाषचंद्र बोस का पसंदीदा विषय था। अध्यात्म की यात्रा करते हुए, भारतीय इतिहास के साथ-साथ महापुरुषों के साहित्य को पढ़ते हुए, उन्होंने सोचा तीर्थ यात्रा की जाये और एक लंबी तीर्थ यात्रा की ओर वे निकल पड़े। उन तीर्थ स्थानों पर उन्होंने धर्म की हानि को बेहद करीब से देखा। वहां उन्होंने पाया कि उच्च हिन्दू धर्म की भिन्न-भिन्न तरीकों से जातिप्रथा, रुढ़ियों, कर्मकांडों के द्वारा दुर्गति हो रही है। एक जगह वे स्वयं लिखते हैं, कि "भारत के पास विश्व को देने के लिए दर्शन है, इतिहास है, विज्ञान है, धर्म है, मूल्य हैं।" लेकिन अपनी आध्यात्मिक यात्रा के दौरान उन्होंने पाया, कि दर्शन, इतिहास, धर्म, मूल्य इत्यादि  धर्म के मूलभूत संस्कार हर तरफ गायब हैं। जातिप्रथा, रूढ़ियों, कर्मकांडों ने इन विशेषताओं को पूरी तरह से खत्म किया हुआ है। इन्हीं चिंताओं ने उन्हें देश की आज़ादी के साथ-साथ देश को बदलने की भी दिशा दी।

दिसंबर 1927 में कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के बाद 1938 में उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया लेकिन कांग्रेस से उनका मोहभंग होने के बाद 16 मार्च 1939 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और आजादी के आंदोलन को एक नई राह देते हुए युवाओं को संगठित करने का प्रयास पूरी निष्ठा से शुरू कर दिया  सुभाषचन्द्र बोस ने 1941 ई. में बर्लिन में इंडियन लीग की स्थापना की, किन्तु जर्मनी ने उन्हें रूस के विरुद्ध प्रयुक्त करने का प्रयास किया, तब उनके सामने कठिनाई उत्पन्न हो गई और उन्होंने दक्षिण पूर्व एशिया जाने का निश्चय किया। एक वर्ष बाद सुभाष चन्द्र बोस पनडुब्बी द्वारा जर्मनी से जापानी नियंत्रण वाले सिंगापुर पहुँचे और पहुँचते ही जून 1943 में टोकियो रेडियो से घोषणा की कि “अंग्रेजों से यह आशा करना बिल्कुल व्यर्थ है कि वे स्वयं अपना साम्राज्य छोड़ देंगे। हमें भारत के भीतर व बाहर से स्वतंत्रता के लिये स्वयं संघर्ष करना होगा”। इससे प्रफुल्लित होकर रासबिहारी बोस ने 4 जुलाई 1943 को 46 वर्षीय सुभाष को आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व सौंप दिया।

21 अक्टूबर 1943 को एशिया के विभिन्न देशों में रहने वाले भारतीयों का सम्मेलन कर उसमें अस्थाई स्वतंत्र भारत सरकार की स्थापना कर नेता जी ने आजादी प्राप्त करने के संकल्प को लिया l 

रंगून के 'जुबली हॉल' में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया भाषण सदैव के लिए इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया, जिसमें उन्होंने कहा था-"स्वतंत्रता संग्राम के मेरे साथियो! स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल की तरह चढ़ा देने वाले पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सकें। 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।' खून भी एक दो बूँद नहीं इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमें में ब्रिटिश साम्राज्य को डूबो दूँ।" यही वो शब्द थे  जिसने नौजवानों में देश प्रेम की भावना से भर दिया और यह वाक्य भारत में ही   नहीं अपितु विश्व के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया 18अगस्त 1945 को टोक्यो के लिए निकलने पर ताइहोकू हवाई अड्डे पर उनका  विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और स्वतंत्र भारत की अमरता  का जयघोष करने वाला भारत मां का दुलारा सदा के लिए राष्ट्र प्रेम की दिव्य ज्योति जला कर अमर हो गया l देश के इस  वीर सपूत की याद में भारत सरकार ने घोषणा की है कि गणतंत्र दिवस समारोह अब 24 जनवरी के बजाय हर साल 23जनवरी से शुरू  होगा। इससे पहले मोदी सरकार ने सुभाष चंद्र बोस की जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की थी। ऐसे समय में जब पूरा देश नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125वीं जयंती मना रहा है, भारत सरकार ने नेताजी की ग्रेनाइट से बनी भव्य प्रतिमा इंडिया गेट पर स्थापित करने का फैसला किया है l जब तक नेताजी बोस की भव्य प्रतिमा  बनकर तैयार नहीं हो जाती, तब तक उनकी होलोग्राम प्रतिमा उसी स्थान पर मौजूद रहेगी l यह उनके प्रति भारत की कृतज्ञता का प्रतीक होगा. आओ हम सब आज मिलकर इस महानायक को याद करते हुए अपने देश को एक सुनहरी भविष्य की ओर ले जाएं l


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