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आस्था का प्रतीक---गुग्गा नवमी

 भारत की प्राकृतिक छटाएँ इसे अपूर्व सौंदर्य से अलंकृत करती हैं। जहाँ दक्षिण में इसके चरणों को सागर की लहरें धोती है तो वहीँ उत्तर में हिमालय की श्वेत चोटियाँ इसका मुकुट बनाती हैं। हिमालय की इसी  गोदी में बसा हिमाचल प्रदेश अपनी बहुरंगी संस्कृति व सौंन्दर्य से ओत-प्रोत इसी प्राकृतिक सौंदर्य का एक अंश है। सदियों  से इस प्रदेश का लोक-जीवन, रहन-सहन, रीति-रिवाज व अनेक देव-परम्पराओं का स्वरूप आज भी अतीत की यादें दोहराता है ।। कदम-कदम पर बदलती हुई लोक भाषा, अनेकों रीति-रिवाजों, भिन्न-भिन्न लोक नृत्यों व देव परम्पराओं से जुड़ा होने के कारण ही यह प्रदेश देव-भूमि कहलाता है । यहाँ  सदियों से चली आ रही बहुत सी परम्पराएँ  आज भी जिंदा है और लोगों की भी इसमें पूरी आस्था है। उसी आस्था की प्रतीक है 9 दिन तक चलने वाली गुगा गाथा जिसे नंगे पांव गुगा का छत्र उठाकर मंडलियां रक्षाबंधन को अपने मंदिरों से निकलती हैं   तथा  जन्माष्टमी तक गुगा जाहरवीर, जिन्हें राजा छतरी जाहरवीर के नाम से भी जाना जाता है,  का घर-घर गुणगान करके नवमी को  अपने घरों में  वापिस पहुँचती हैं ।  इस मंडली में चलना आसान नहीं है, इसके लिये भादों माह की पूर्णिमा से लेकर जन्माष्टमी के अगले दिन तक छत्र ले कर चलने वाले प्रमुख पुजारी को नंगे पांव चलना होता है, यह लोग जमीन पर भी नहीं बैठ सकते। लोगों के घरों में जैसे ही यह  मंडलियां पहुंचती हैं तो महौल भक्तिमय हो जाता है। पुरानी संस्कृति के अनुसार इसको सुनना शुभ माना जाता है I लोग श्रद्धा से उनकी छतरी पर डोरियाँ, चूड़ियाँ, श्रृंगार का सामान, कपड़े की कतरने आदि बाँध कर मंगल की कामना करते हैं I

ऐसी मान्यता है  कि गुग्गावीर भगवान विष्णु का प्रसाद है जो शिव की जटाओं से फल के रूप में निकला था। यह फल सांपों का शत्रु था। जिसे एक बार सभी सांपों व नागों की प्रार्थना पर भगवान शिव ने अपनी जटाओं में बांध लिया था। जब बागड़ देश (राजस्थान का  श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ (नोहर और भादरा) जिले का क्षेत्र ) की रानी बाछला को संतान प्राप्ति के लिए यह फल देने गुरु गोरखनाथ जा रहे थे तो रास्ते में सांपों को सर्वनाश से बचाने के लिए वासुकी नाग ने छल द्वारा गुरु गोरखनाथ से यह फल मांग कर खा लिया।  भगवान विष्णु ने इसके बाद दयालक ऋषि को भेजा और दयालक ऋषि ने बासुकी नाग के सिर पर झाड़ू मारकर इस फल को गूग्गल धूप में परिवर्तित कर दिया क्योंकि सांप गूग्गल धूप नहीं खाते इसलिए गूग्गल धूप से की गई गुग्गा जी की पूजा को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यही फल गुरु गोरखनाथ ने भगवान शिव के कहने पर रानी बाछला को दिया था जिसके प्रभाव से 12 मास पश्चात गुग्गा जी का जन्म हुआ। गुग्गा जी के जन्म लेते ही सभी देवी-देवताओं में खुशी की लहर दौड़ गई। गुगल फल के नाम से इनका नाम गुग्गामल पड़ा। गुरू गोरखनाथ के आशीर्वाद  से राजा गुग्गामल महा-वीर, नागों को वश में करने वाले तथा सिद्धों के शिरोमणि हुए I उनके मन्त्र के जाप से वासुकी जैसे महानाग के विष का प्रभाव भी शांत हो गया था I लोग उन्हें गोगाजी, गुग्गा, जाहर वीर व जाहर पीर, जाहरवीर के नामों से पुकारते हैं। यह व्यापक धारणा है कि वह भाद्रपद कृष्ण पक्ष की नवमी को प्रकट हुए थे और इसलिए इसे गुग्गा नवमी के नाम से भी जाना जाता है इस दिन  भक्त गुग्गा जी की मूर्ति का पूजन करते हैं  चित्रों में वह नीले रंग के घोड़े की सवारी करते हुए दिखाई देते हैं हिमाचल प्रदेश में शायद ही कोई ऐसा गांव होगा जहां गुग्गा जाहरवीर का मंदिर न हो। हमीरपुर में गलोड़ का लहडा़ गुग्गा ,टौणी देवी का कोल्हू सिद्ध इत्यादि ऐसे प्राचीन मंदिर हैं जहाँ मान्यता है कि यहां माथा टेकने मात्र से ही सर्पदंश नहीं होता और यहां की मिट्टी के छिड़काव से घरों में सांप इत्यादि का प्रवेश भी नहीं होता है। ऐसा भी माना जाता है कि गुग्गा जाहरवीर की पूजा से घर में मवेशीधन की वृद्धि होती है और गुग्गा विभिन्न बीमारियों से मवेशियों की रक्षा भी करते हैं। गुग्गा  नवमी पर हिंदू भक्त किसी भी चोट या नुकसान से सुरक्षा के आश्वासन के रूप में भगवान गुग्गा को राखी या रक्षा सूत्र भी  बाँधते हैं I गुग्गा  देव जी के मंदिरों में इस दिन विभिन्न पूजा और जुलूस आयोजित किए जाते हैं I इसके अलावा इस दिन ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न स्थानों पर मेलों का आयोजन भी  किया जाता है I हमारी प्राचीन सभ्यता व संस्कृति अमूल्य धरोहर है। बदलते परिवेश में लोक संस्कृति को बचाए रखना बेहद जरूरी है। इसलिए लोक कला व संस्कृति के संरक्षण को बढ़ावा देना होगा। हिमाचल  में रहने वाले हर एक व्यक्ति को अपनी पहाड़ी संस्कृति को बढ़ावा देने में योगदान देना चाहिए तथा अपनी संस्कृति को आगे बढ़ाना चाहिए।आज की नई पीढ़ी अपनी संस्कृति को छोड़ कर आधुनिकता की दौड़ में आगे निकलती जा रही है  और इसी  युवा पीढ़ी को बस सही दिशा दिखाने की जरूरत है। क्यूंकि  अगर हम स्वयं अपनी संस्कृति का मूल रूप बचाए रखने के लिए ईमानदार प्रयास  करेंगे तो इसे विश्वव्यापी बनाया जा सकता है 

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